________________ (18) भावस्तव सामायिक में प्राप्त होजाता है, इस वास्ते श्रावक सामायिक में द्रध्यस्तवरूप जिन पूजा न करें। जैनतत्वादर्श पृ० 371) इनके सिवाय “पर्यपण पर्वनी कथाओं के पृ० 16 में भी लिखा है कि' वली सामायिक करता थकां सावध योग नो स्याग थाय, माटे सामायक श्रेष्ठ छ, तथा सामायक करनार ने मात्र पूजादिक ने विषे पण अधिकार नथी, अर्थात् द्रव्यस्तव करण नी योग्यता नथी, ते सामायिक उदय प्रायव महा दुर्लभ छ। इन दो प्रमाणों के सिवाय सामायिक की उत्कृष्टता में और भी प्रमाण दिये जा सकते हैं, किन्तु अन्य गौरव के भय से यहां इतना ही बताया जाता है, इससे स्पष्ट सिद्ध होता है किमूर्ति पूजक भाइयों के कथन से भी मूर्ति पूजा से सामायिक अत्यधिक श्रेष्ठ है। एक साधारण बुद्धि वाला भी समझ सकता है कि-मूर्ति पूजा सावद्य-हिंसाकारी-व्यापार है, और सामायिक में सावध व्यापार का त्याग हो जाता है, इस नग्न सत्य को मूर्ति पूजक भी स्वीकार कर चुके हैं, इसलिए मूर्ति पूजक समाज के साधुओं को चाहिये कि-श्रावकों को सावध मूर्ति पूजा छोड़ कर सावध त्याग रूप सामायिक करने का ही उपदेश करें, किन्तु जब मनुष्य मतमोह में पड़ जाता है तब हेय को छोड़ने योग्य समझकर भी नहीं छोड़ता है, यही हाल ऊपर में सामायिक को श्रेष्ठ कहने वाले श्री विजयानन्दजी का भी हुआ पहले सामायिक की प्रशंसा की और फिर ये ही आगे बढ़ कर सामायिक वाले श्रावक को सामायिक छोड़कर पजा के लिए फूल गूंथने आदि की आज्ञा प्रदान करते है / देखिये