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________________ श्री राजेन्द्र सुबोधनी आहोरी - हिन्दी - टीका 2-1-1-3-6 (353) 55 क्षौमपट याने सूती वस्त्र का परिग्रहण करने से तीन उपकरण होतें हैं तथा अन्य को जलबिंदु एवं परिताप आदि से रक्षण के लिये और्णिक याने ऊनी वस्त्र (कंबल) के परिग्रहण से चार उपकरण... तथा असहिष्णु जिनकल्पिक साधु को एक और दुसरा क्षौमपट सूती-वस्त्रका परिग्रहण करने से पांच उपकरण... तथा छिद्रपाणिवाले जिन-कल्पिकों को सात प्रकार के पात्र के उपकरणों के साथ रजोहरण एवं मुखवस्त्रिका (मुहपत्ती) का परिग्रहण करने से नव (9) उपकरण होतें हैं... तथा 9 + 1 सूती कपडा = 10... तथा 10 + 1 ऊनी कपडा (कंबल) = 11 उपकरण तथा 11 + 1 = 12 उपकरण एक और सूतीवस्त्र के परिग्रहण करने से बारह उपकरण होतें हैं... पात्र के सात उपकरण निम्न प्रकार से हैं... 1. पात्र, 2. पात्रबंधन, 3. पात्रस्थापन, 4. पायकेशरिया (चरवली), 5. पल्ला, 6. रजस्राण, 7. गुच्छक (गुच्छा)... - अन्य जगह भी जाते हुए जिनकल्पिक साधु सभी उपकरणों को साथ लेकर हि जाएं... जैसे कि- वह भिक्षु (साधु) गांव आदि के बाहर विहारभूमि याने स्वाध्यायभूमि तथा विचारभूमि याने मल (विष्टा) विसर्जन भूमि में भी सभी उपकरणों को लेकर हि प्रवेश करे या बाहार निकले... यह दुसरा सूत्र है, इसी प्रकार यामांतरे इत्यादि तीसरा सूत्र है... अब गमन के अभाव के निमित्त सूत्रकार महर्षि आगे के सूत्र में कहेंगे... V. सूत्रसार: प्रस्तुत सूत्र में बताया गया है कि- जिनकल्पी या प्रतिमाधारी साधु को आहार के लिए या शौच एवं स्वाध्याय आदि के लिए अपने ठहरे हुए स्थान से बाहर जाते समय अपने सभी उपकरण साथ ले जाने चाहिए। जब कि- सूत्र में जिनकल्पी या स्थविरकल्पी का कोई उल्लेख नहीं है। परन्तु, उपकरण ले जाने के कारणों से यह ज्ञात होता है कि- यह प्रसंग जिनकल्पी आदि के लिए ही हो सकता है। जिनकल्पी एवं विशिष्ट प्रतिमाधारी मुनि गच्छ से अलग अकेला रहता है। अतः उसके बाहर जाने के बाद यदि वर्षा हो जाए तो उसके उपकरण भीग सकते हैं या कभी कोई चोर उन्हें उठाकर ले जा सकता है। स्थविरकल्पी साधु कम . से कम दो साधु रहते हैं, अतः एक-दूसरे को सावधान करके अपने स्थान से बाहर जा सकता है, अतः उसके लिए ऐसा प्रसंग आ नहीं सकता। दूसरे में जिनकल्पी मुनि के पास अधिक उपकरण नहीं होते। सामान्य रूप से रजोहरण और मुखवस्त्रिका ही होती है ओर यदि वह लज्जा पर विजय पाने में समर्थ नहीं है तो एक छोटा-सा चोलपट्टक (धोती के स्थान में लपेटने का वस्त्र) रख सकता है, जिसका उपयोग गांव या शहर में आहार आदि को जाते समय करता है और ये उपकरण तो सदा
SR No.004438
Book TitleAcharang Sutram Part 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayprabhvijay, Rameshchandra L Haria
PublisherRajendra Yatindra Jainagam Hindi Prakashan
Publication Year
Total Pages608
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_acharang
File Size14 MB
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