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________________ 250 # 1-1-5-7 (46) // श्री राजेन्द्र यतीन्द्र जैनागम हिन्दी प्रकाशन % 3D परिज्ञाविशिष्ट ज्ञान से प्रतिपादन किया है / चेव-समुच्चय और अवधारण अर्थ में है / इमस्सजीवियस्स-इस जीवन के लिए / परिवन्दण-माणण-पूयणाए-प्रशंसा, मान एवं पूजा की अभिलाषा से / जाई-मरण-मोयणाए-जन्म-मरण से मुक्त होने की आकांक्षा से। दक्खपडिघायहेउं-दःख से छटकारा पाने हेत / से-वह / सयमेव-स्वयमेव / वणस्सइसत्थंवनस्पति के शस्त्र से / समारंभइ-वनस्पतिकाय का समारंभ करता है / वा-अथवा / अण्णेहिंअन्य से / वणस्सइसत्थं-वनस्पति शस्त्र से / समारम्भावेइ-समारंभ कराते हैं / वा-अथवा। वणस्सइ सत्थं-वनस्पति शस्त्र से / समारंभमाणे-आरम्भकरनेवाले / अण्णे-अन्य व्यक्ति को। समणुजाणइ-अच्छा जानते हैं / तं-यह वनस्पतिकाय का आरंभ / से-उसको / अहियाएअहितकर है / तं-यह / से-उसको / अबोहीए-अबोध का कारण है / से-वह / तं-उस आरम्भ के स्वरूप को / संबुज्झमाणे-भली-भांति समझकर / आयाणीयं-सम्यग्दर्शन-ज्ञान और चारित्र का / समुट्ठाय स्वीकार करके | भगवओ-भगवान / वा-अथवा / अणगाराणंअनगारों के / अन्तिए-समीप में / सोच्चा-सुनकर / इह-इस लोक में। एगेसिं-किसी-किसी व्यक्ति को / णायं भवति-ज्ञात हो जाता है कि / एस-यह आरंभ / खलु-निश्चय रूप से। गंथे-अष्ट कर्मों की गांठ है / एस खलु-यह निश्चय ही / मोहे-मोह रूप है / एस खलुयह निश्चय ही / मारे-मृत्यु का कारण है / एस खलु-यह निश्चय ही। णरए-नरक का कारण है / इच्चत्थं-इस प्रकार अर्थ-विषय-वासना में / गढिए-आसक्त बना हुआ / लोएलोक-प्राणी समूह / जमिणं-जिससे कि यह / विरूवरूवेहि-विभिन्न प्रकार के / सत्थेहिंशस्त्रों से वणस्सइ कम्म समारंभेणं-वनस्पति कर्म समारंभ से / वणस्सइ सत्थं-वनस्पति शस्त्र से / समारंभमाणे-आरम्भ करता हुआ / अण्णे-अन्य / अणेगरूवे-अनेक प्रकार के / पाणेप्राणियों की / विहिंसंति-हिंसा करता हैं / IV सूत्रार्थ : इस सूत्रका हिंदी अनुवाद, पूर्व कहे गये सूत्र क्रमांक - 24 अनुसार समझीयेगा... केवल अप्कायकी जगह वनस्पतिकाय कहीयेगा... वह इस प्रकार... __ हे जम्बू ! तू, सावद्य-अनुष्ठान से लज्जमान विभिन्न मत वाले व्यक्तियों को देख / . जो अपने आपको अनगार कहते हुए भी विभिन्न शस्त्रों से तथा वनस्पति कर्म समारंभ से वनस्पतिकायिक, जीवों की तथा उसके साथ वनस्पति के आश्रय में रहे हुए अन्य द्वीन्द्रियादि प्राणियों की हिंसा करते हैं / भगवान ने अपने विशिष्ट ज्ञान से यह प्रतिपादन किया है किवे विनश्वर जीवन के लिए, प्रशंसा-मान-सम्मान एवं पूजा-प्रतिष्ठा पाने की अभिलाषा से - एवं जन्म-मरण से मुक्त होने की आकांक्षा से तथा मानसिक एवं शारीरिक दुःखों से छुटकारा पाने हेतु स्वयं वनस्पतिकाय का आरंभ करते हैं, दूसरों के द्वारा कराते हैं तथा आरंभ करते हुए अन्य व्यक्ति का समर्थन करते हैं / उनके लिए यह आरंभ अहित और अबोधि का कारण
SR No.004435
Book TitleAcharang Sutram Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayprabhvijay, Rameshchandra L Haria
PublisherRajendra Yatindra Jainagam Hindi Prakashan
Publication Year
Total Pages390
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_acharang
File Size10 MB
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