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________________ श्री राजेन्द्र सुबोधनी आहोरी - हिन्दी - टीका // 1-1-4-6 (39) म 217 प्रत्यक्ष / विसवसवेहि-नाना प्रकार के / सत्थेहि-शस्त्रों से / अगणिकम्मसमारंभेण-अग्नि कर्म समारम्भ से / अगणि सत्थं समारम्भमाणे-अग्नि शस्त्र का समारम्भ प्रयोग करते हुए / अणेगसवे-अनेक प्रकारके / अण्णे-अन्य / पाणे-प्राणियों की। विहिंसंति-हिंसा करते हैं / तत्थ-अग्निकाय के आरम्भ विषयक / खल-निश्चय ही / भगवता-भगवान ने / परिणापरिज्ञा / पवेड्या-प्रतिपादन की है / इमस्स चेव-इसी / जीवियस्स-जीवन के लिए / परिवंदण-माणण-पूयणाए-प्रशंसा, मान-सम्मान और पूजा के लिए। जाई-मरण-मोयणाएजन्म-मरण से छुटकारा पाने के लिए | दुक्खपडियायहेउं-दुःखों का नाश करने के लिए / से-वह / सयमेव-स्वयमेव / अगणि सत्थं समारम्भइ-अग्निकाय शस्त्र से समारम्भ करता है / वा-अथवा / अण्णेहि-दूसरों से / अगणि सत्थं-अग्नि शस्त्र से / समारम्भावेइ-समारम्भ कराता है / वा-तथा / अगणि सत्थं-अग्नि शस्त्र का / समारम्भमाणे-समारम्भ करने वाले / अण्णे-अन्य व्यक्ति का / समणुजाणइ-समर्थन करता है / तं-वह आरम्भ / से-उसको | अहियाए-अहितकर होता है। तं-वह आरम्भ | से-उसको। अबोहियाए-अबोधि के लिए होता है / से तं-जिसको यह असदाचरण बता दिया गया है, वह शिष्य, संबुज्झमाणे-अग्नि के आरंभ को.पाप रूप जानता हुआ / आयाणीयं-आचरणीय-सम्यग् दर्शनादि को प्राप्त कर / भगवओ-भगवान के समीपः / वा-अथवा / अणगाराणां-अणगारों के समीप / सोच्चासुनकर। इह-इस लोक में / एगेसिं-किसी किसी व्यक्ति को / णायं-ज्ञात हो जाता है / एस खलु-यह अग्निकाय का समारम्भ निश्चय ही। मोहे-मोह का कारण है / एस-यह / खलु-निश्चय ही / गंत्थे-अष्ट कर्म की गांठ है / एस खल-यह निश्चय ही / मारे-मृत्यु का कारण है / एस खलु-यह निश्चय ही / णरए-नरक का कारण है / इच्चत्थं-इस अर्थ के लिए / गड्ढिए-मूर्छित / लोए-लोक हैं / जमिणं-जो यह प्रत्यक्ष / विरूवसवेहि-नाना प्रकार के / सत्थेहि-शत्रों से / अगणि कम्मसमारम्भमाणे-अग्नि का समारम्भ करते हुए / अण्णेअन्य / पाणे-प्राणियों की भी। विहिंसइ-हिंसा करते हैं / IV सूत्रार्थ : हे जम्बू ! तू इन विभिन्न धर्मानुयायियों को देख, जो स्वागमानुसार साधु क्रिया करके लज्जित होते हुए भी, अपने आप को अनगार कहते हैं / यह स्पष्ट हैं कि- वे विभिन्न शस्त्रों से, अग्निकर्म समारंभ से अग्निकायिक जीवों एवं अन्य अनेक तरह के स-स्थावर जीवों की हिंसा करते हैं / अतः भगवान ने परिज्ञा विशिष्ट ज्ञान से यह प्रतिपादन किया है कि- प्रमादी जीव, इस क्षणिक जीवन के लिए, प्रशंसा मान-सम्मान एवं पूजा पाने के हेतु, जन्म मरण से छुटकारा पाने की अभिलाषा से, तथा शारीरिक एवं मानसिक दुःखो के विनाशार्थ, स्वयं अग्नि का आरंभ करते हैं, दूसरे व्यक्तिसे कराते हैं और करने वाले अन्य को अच्छा समझते हैं / परंतु यह समारम्भ उनके लिए अहितकर है, अबोधि का करण है / इस प्रकार भगवान से
SR No.004435
Book TitleAcharang Sutram Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayprabhvijay, Rameshchandra L Haria
PublisherRajendra Yatindra Jainagam Hindi Prakashan
Publication Year
Total Pages390
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_acharang
File Size10 MB
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