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________________ शिक्षा स्वयं में स्वावलम्बी रहने की प्रकृतिवाली है, इस शिक्षा को जो आत्मसात् कर लेता है उसके जीवन की परवशता सदा-सदा के लिए समाप्त हो जाती है। हरिभद्र ने स्वाधीन श्रेष्ठतम सुधियों में अपना स्थान रखने का अधिकार शिक्षा के बल पर उपार्जित कर लिया था। राजकीय परम्परा से मण्डित एक महामनीषी हरिभद्र को कथाकारों ने स्वीकृत किया है, उनकी भारतीय वाद-विजेता के रूप में अपूर्व प्रख्याति थी। ज्ञान-सम्मान और सत्ता इन त्रिवेणी योग का संगम उनके जीवन में था, उनकी बुद्धि तर्क से कुशाग्र होने के कारण वे तार्किकों में अग्रगण्य माने जाते थे अतः पृथ्वा, पानी तथा आकाश में निवास करने वाले सभी विद्वानों को परास्त करने के महामोहाभिमान से कुदाली, जाल तथा निसेनी रखते थे तथा विद्यामद से विदीर्ण न हो जाए अत: पेट पर सोने का पट्टा बांधते थे, तथा जम्बूद्वीप में मेरे समान अद्वितीय कोई नहीं है यह बताने हेतु हाथ में जम्बू की डाली लेकर घूमते थे जिसका पाट इस प्रकार है। परिभवनमतिर्महावलेपात् क्षितिसलिलाम्बरवासिना बुधानाम्। अवदारणजालकाधिरोहण्यपि स दधौ त्रितयं जयाभिलाषी।। स्फुटति जठरमत्र शास्त्र शास्त्रपूरादिति स दधावुदरे सुवर्णपट्टम् / ' मम सममतिरस्ति नैव जम्बूक्षितिवलये वहते लतां स जम्ब्वाः / / इस प्रकार वे अपने आपको कलिकाल सर्वज्ञ मानते थे। 3. प्रतिज्ञाबद्ध प्रोन्नत पुरुष :- अपने आपको सर्वज्ञ मानते हुए भी वे सरलता की प्रतिकृति थे / अत: इससे भी परे कोई विशिष्ट तत्त्व, जिज्ञासा उनके अंत: स्थल में मानो तरंगित होकर उनको प्रतिज्ञा के लिए प्रेरित कर रही थी / इस हेतु उन्होंने अपने मानसमेधा में यह दुस्तर प्रतिज्ञा करली कि मेरे मति-वैभव से यदि कोई अज्ञात तत्त्व रह जाय तो उसका सुबोध प्राप्त करने हेतु स्वयं चरणों में अपना जीवन समर्पित करके शिष्यत्व स्वीकार कर लूंगा ! महापुरुष हमेशा सत्य प्रतिज्ञा के पालक होते है कहा भी गया है - . "रघुकुल रीति सदा चलि आई / प्राण जाय पर वचन न जाई // " अपने आपको सर्ववेत्ता मानते हुए भी वे सरलता की प्रतिकृति थे। भवितव्यता भाग्य को भव्य बना देती है और एक दिन उनके जीवन का महापरिवर्तन योग उस प्रतिज्ञा के बल से आ गया। ऐसा हुआ कि एकबार अनेक पाठकगणों से युक्त साथ ही विरुदावलियों के गुंजारव से वातावरण को गुंजित करते हुए सुखासन पालखी में आसनस्थ होकर राजदरबार की तरफ प्रयाण कर रहे थे। उस समय एक मदोन्मत्त हाथी दुकानों और मकानों को छिन्न-छिन्न करता लोगों को अत्यंत शोक से व्याकुल करता, पशु-पक्षियों को भयभीत करता, अपने सिर को त्वरितता से हिलाता सामने आता हुआ देखकर ऊँचे वृक्ष ऊपर से पुष्प के समूह को लेकर बंदर जिस प्रकार चंचल स्वभाव से सूर्य की तरफ फेंकता है उसी प्रकार वे विप्र भी सहसा जिनमंदिर में गये और ऊँची दृष्टि करने | आचार्य हरिभद्रसूरि का व्यक्तित्व एवं कृतित्व VIIIIIIIIIIII प्रथम अध्याय
SR No.004434
Book TitleHaribhadrasuri ke Darshanik Chintan ka Vaishishtya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnekantlatashreeji
PublisherRaj Rajendra Prakashan Trsut
Publication Year2008
Total Pages552
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size14 MB
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