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________________ केवलज्ञान / 315 संख्या इस प्रकार- निर्दिष्ट है |1. नपुंसक स्त्री पुरुष 2. गृहलिंग अन्यलिंग स्वलिंग 10 20 108 4 10 108 3. उत्कृष्ट अवगाहना जघन्य अवगाहना मध्यम अवगाहना 108 4. ऊर्ध्वलोक समुद्र अन्य जलाशय नीचालोक तिरछालोक 20 108 सिद्ध के पन्द्रह भेद नंदी सत्रकार के स्वोपज्ञ हैं या इनका कोई प्राचीन आधार है? प्रतीत होता है यह परम्परा प्राचीन है। उमास्वाति ने सिद्ध की व्याख्या में बारह अनुयोग द्वार बतलाए हैं। वे प्रस्तुत सूत्र में निर्दिष्ट पन्द्रह भेदों की अपेक्षा अधिक व्यापक हैं। . स्थानांग में सिद्ध के पन्द्रह प्रकारों का उल्लेख मिलता है / प्रज्ञापना में भी इनका उल्लेख है / स्थानांग संकलन सूत्र है इसलिए इसकी प्राचीनता के बारे में निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता / प्रज्ञापना नन्दी की अपेक्षा प्राचीन है। इसलिए प्रज्ञापना उसके पश्चात् तत्त्वार्थ सूत्र और उसके पश्चात् नंदी में इन पन्द्रह भेदों का कालक्रम का निर्धारण किया जा सकता है। हो सकता है श्यामाचार्य ने किसी प्राचीन आगम से उनका अवतरण किया है। केवली : योगनिरोध की प्रक्रिया केवली का जीवनकाल जब अन्तर्मुहूर्त मात्र शेष रहता है, तब वह मन, वचन और काया की प्रवृत्ति का निरोध करता है। उसकी प्रक्रिया इस प्रकार है. शुक्ल ध्यान के तृतीय चरण (सूक्ष्म-क्रिया-अप्रतिपाति) में वर्तन करता हुआ वह सर्वप्रथम मनोयोग का निरोध करता है / जो जीव पर्याप्त है, संज्ञी है, जघन्य मनयोगी (सबसे कम मन की प्रवृत्ति करने वाला) है, उसके जितने मनोद्रव्य (मन के पुद्गल) है और उनके जितने व्यापार (प्रवृत्ति) हैं, उससे असंख्येय गुणहीन मनोद्रव्य और व्यापार का प्रतिसमय निरोध करते-करते असंख्य समयों में उसका पूर्ण निरोध करता है। उसके पश्चात् वचन योग का निरोध करता है। पर्याप्तमात्र द्वीन्द्रिय प्राणी के जघन्य वचनयोग के पर्यायों से असंख्येय गुणहीन वचन-योग-पर्यायों का प्रतिसमय निरोध करते-करते असंख्य समयों में वचनयोग का पूर्ण निरोध करता है / फिर काययोग
SR No.004411
Book TitleAarhati Drushti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMangalpragyashreeji Samni
PublisherAdarsh Sahitya Sangh Prakashan
Publication Year1998
Total Pages384
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
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