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________________ 137 सूयगडो सु. 1 अ. 12 विणयं ति तइयं अण्णाणमाहंसु चउत्थमेव // 1 / / अण्णाणिया ता कुसला वि संता असंथुया णो वितिगिच्छतिण्णा / अकोविया आहु अकोवियेहिं अणाणुवीइत्तु मुसं वयंति-॥२॥ सच्चं असचं इति चिंतयंता असाहु साहु त्ति उदाहरंता / जेमे जणा वेणइया अणेगे पुट्ठा वि भावं विणइंसु णाम // 3 / / अणोवसंखा इइ ते उदाहु अढे स ओभासइ अम्ह एवं / लवावसंकी य अणागएहिं णो किरियमाहंसु अकिरियवाई // 4 // संमिस्सभावं च गिरा गहीए से मुम्मुई होइ अणाणुवाई / इमं दुपक्वं इममेगपक्खं आहंसु छलाययणं च कम्मं // 5 // ते एवमक्खंति अबुज्झमाणा विरूवरूवाणि अकिरियवाई / जे मायइत्ता बहवे मणूसा भमंति संसारमणोवदग्गं // 6 / / णाइचो उएइ ण अत्थमेइ ण चंदिमा वढइ हायई वा / सलिला ण संदंति ण वंति वाया वंझो णियओ कसिणे हु लोए // 7 // जहा हि अंधे सह जोइणा वि रूवाई णो पस्सइ हीणणेत्ते / संतं पि ते एवमकिरियवाई किरियं ण पस्संति णिरुद्धपण्णा / / 8 // संवच्छरं सुविणं लक्खणं च णिमित्तदेहं च उप्पाइयं च / अटुंगमेयं बहवे अहित्ता लोगंसि जाणंति अणागयाई // 9 // केई णिमित्ता तहिया भवंति केसिंचि तं विप्पडिएइ णाणं / ते विज्जभावं अणहिज्जमाणा आहंसु विज्जा परिमोक्खमेव // 10 // ते एवमक्खंति समिच्च लोगं तहा तहा समणा माहणा य.। सयंकडं णण्णकडं च दुक्खं आहेसु विज्जाचरणं पमोक्खं // 11 // ते चक्खु लोगंसिह णायगा उ मग्गाणुसासंति हियं पयाणं / तहा तहा सासयमाहु लोए जंसी पया माणव ! संपगाढा / / 12 // जे रक्खसा वा जमलोइया वा जे वा सुरा गंधव्वा य काया / आगासगामी य पुढोसिया जे पुणो पुणो विप्परियासुवेति / / 13 // जमाहु ओहं सलिलं अपारगं जाणाहि णं भवगहणं दुमोक्खं / जंसी विसण्णा विसयंगणाहिं दुहओऽवि लोयं अणुसंचरंति / / 14 // ण कम्मुणा कम्म खवेंति बाला अकम्मुणा कम्म खवेंति धीरा। मेहाविणो लोभमयावईया संतोसिणो णो पकरेंति.पावं // 15 / / ते तीयउप्पण्णमणागयाइं लोगस्स जाणंति तहागयाइं / णेयारो अण्णेसि अणण्णणेया बुद्धा हु ते अंतकडा भवंति // 16 // ते णेव कुव्वंति ण कारवेंति भूयाहिसंकाइ दुगुंछमाणा। सया जया विप्पणमंति धीरा विण्णत्ति धीरा य हवंति एगे // 17 // डहरे य पाणे वुड्ढे य पाणे ते अत्तओ पासइ सव्वलोए / उव्वेहईलोगमिणं महंतं बुद्धेऽपमत्तेसु परिव्वएज्जा // 18 // जे आयओ
SR No.004390
Book TitleAngpavittha Suttani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanlal Doshi, Parasmal Chandaliya
PublisherAkhil Bharatiya Sadhumargi Jain Sanskruti Rakshak Sangh
Publication Year1982
Total Pages1476
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, agam_acharang, agam_sutrakritang, agam_sthanang, agam_samvayang, agam_bhagwati, agam_gyatadharmkatha, agam_upasakdasha, agam_antkrutdasha, & agam_anutta
File Size23 MB
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