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________________ को केवल प्रातिभ अनुभूति की संज्ञा देकर रह जाता है। लामा गोविन्द के मतानुसार भी "रहस्यवाद असीम तथा जो कुछ भी अस्तित्व में है, उस समग्र की विश्वात्मक एकता की प्रातिभ अनुभूति है और इसके अन्तर्गत समग्र चेतना समस्या जीवन तत्त्व तक आ जाता है। जबकि रुडोल्फ ओहो के अनुसार, रहस्यवाद सीमित में असीम को धारण करने के लिए है। वे उसे अनन्त का रहस्यवाद कहते हैं। 4. मनोवृत्ति के रूप में-रहस्यवाद को मनोवृत्ति के रूप में व्यक्त करने वाले वान हार्टमैन का कथन है, "रहस्यवाद चेतना का वह तृप्तिमय बोध है, जिसमें विचार, भाव एवं इच्छा का अंत हो जाता है तथा जहाँ अचेतना से ही उसकी चेतना जागृत होती है। इसी तरह इ. केयर्ड रहस्यवाद को चित्त की मनोवृत्ति विशेष कहते हैं। रहस्यवाद अपने चित्त की वह विशेष मनोवृत्ति है, जिसके बन जाने पर अन्य सारे संबंध ईश्वर के प्रति आत्मा के सम्बन्ध के अन्तर्गत जाकर विलीन हो जाते हैं। केयर्ड की इसी परिभाषा की अपेक्षा आर.डी. रानाडे ने इसकी अधिक समीचीन व्याख्या की है। उनके अनुसार मात्र ईश्वर के साथ ही सम्बन्ध नहीं होता है, अपितु आनन्द का भी अनुभव होता है। हीलर ऐसी मानसिक अनुभूति को अनन्त के प्रति समर्पण और समाधि बताते हैं। उनके अनुसार, "रहस्यवाद में मूलभूत मानसिक अनुभूति जीवन के आवेग से इन्कार है, जीवन की थकान से इन्कार है। अनन्त को निःसंकोच समर्पण और जो समाधि है, उसकी पराकाष्ठा है। रहस्यवाद जीवन की निष्क्रियता, शान्तता, वीतरागी और चिन्तनशील है।" सी.एफ.ई. स्पर्जन रहस्यवाद का स्वभाव विशेष और वातावरण विशेष कहते हैं। उनके अनुसार वास्तव में रहस्यवाद किसी धार्मिक मत की अपेक्षा एक स्वभाव विशेष है और दार्शनिक पद्धति की अपेक्षा. एक वातावरण विशेष है। इस प्रकार चेतना, संवेदना, अनुभूति और मनोवृत्ति के रूप में रहस्यवाद की उपर्युक्त व्याख्याएँ एवं परिभाषाएँ उसके दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक पक्ष को ही अभिव्यक्त करती हैं। ये केवल शास्त्रीय पहलू पर बल देती हैं, उसकी व्यावहारिकता पर नहीं। विशुद्ध चेतना को महत्त्व देने वाली रहस्यवाद की व्याख्याएँ मानसिक वृत्तियों के मूल स्रोत तक अथवा अन्तिम सूक्ष्म ज्ञानपरक स्थिति तक ले जाकर कोई तत्त्वज्ञान का ही परिचय देती प्रतीत होती है। संवेदन को व्याख्यायित करने वाली परिभाषाओं में भी यही दोष परिलक्षित होता है। यद्यपि 'अनुभूति' परक परिभाषाएँ व्यावहारिकता का विचार करती हैं, तथापि वे व्यक्तिगत सीमा तक ही सीमित हैं और उससे भी आन्तरिक संवेदन की ही प्रधानता दिखाई देती है। अन्तिम मनोवृत्ति परक व्याख्याओं में व्यावहारिक रूप दृष्टिगत होता है और उसे मनोवृत्ति अथवा स्वभाव विशेष बताया गया है। साथ ही वह एकमात्र आन्तरिक प्रक्रिया नहीं रहती। तदुपरान्त वह व्याख्या भी आध्यात्मिक दृष्टि से मार्गरक्षक से अधिक महत्त्व की पहलू पर चिन्तन दिया है। अतः इन व्याख्याओं के अध्ययन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि ये व्याख्याएँ एकांगी हैं। इन पाश्चात्त्य विद्वानों के अतिरिक्त कुछ अन्य पाश्चात्त्य चिन्तकों ने भी रहस्यवाद की परिभाषाएँ देने की चेष्टा की है। उनमें से एफ.डब्ल्यू.ई. हार्किंग हैं, जिन्होंने रहस्यवाद को साधन के रूप में स्वीकार किया है। 483 Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.004261
Book TitleMahopadhyay Yashvijay ke Darshanik Chintan ka Vaishishtya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmrutrasashreeji
PublisherRaj Rajendra Prakashan Trust
Publication Year2014
Total Pages690
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size20 MB
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