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________________ 192 . नवम अध्याय मार्गाच्यवननिर्जरार्थं परिषोढव्याः परीषहाः।।8।। . सूत्रार्थ - मार्ग से च्युत न होने के लिए और कर्मों की निर्जरा करने के लिए जो ___ सहन करने योग्य हों, वे परीषह हैं।।8।। क्षुत्पिपासाशीतोष्णदंशमशकनाग्न्यारतिस्त्रीचर्यानिषद्याशय्याक्रोशवधयाचनालाभरोगतृणस्पर्शमलसत्कारपुरस्कारप्रज्ञाज्ञानादर्शनानि।।।। सूत्रार्थ - क्षुधा, तृषा, शीत, उष्ण, दंशमशक, नग्नता, अरति, स्त्री, चर्या, निषद्या, शय्या, आक्रोश, वध, याचना, अलाभ, रोग, तृणस्पर्श, मल,सत्कार पुरस्कार, प्रज्ञा, अज्ञान और अदर्शन - इन नामवाले परीषह हैं।।9।। परीषह क्यों सहना ppyRELAMOURNA भूख मार्ग (रत्नत्रय-संवर) निर्जरा के लिए से च्युत न हो 22 परीषह परीषह स्वरूप परीषहम स्वरूप 1. क्षुधा 12. आक्रोश | कठोर वचन 2. तृषा प्यास 13. वध | मारना 3. शीत ठण्ड 14.याचना | माँगना गर्मी 15. अलाभ | आहारादि की अप्राप्ति 5. दंशमशक | मच्छरादि का काटना |16. रोग | व्याधियाँ (चेतन) 17. तृणस्पर्श | काँटे, कंकर आदि का 6. नग्नता बालकवत् जन्मजात स्पर्श (अचेतन) 18. मल शरीर पर एकत्रित मल 7. अरति अच्छा न लगना 19. सत्कार | पूजा-प्रशंसा 8. स्त्री सभी प्रकार की स्त्री | -पुरस्कार 9. चर्या गमन 20. प्रज्ञा पाण्डित्य का गर्व 10. निषद्या बैठना 21. अज्ञान ज्ञान का कम होना 11. शय्या सोना | 22. अदर्शन मनि मार्ग से आस्था चलित होना Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.004253
Book TitleTattvartha Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPuja Prakash Chhabda
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2010
Total Pages258
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size17 MB
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