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________________ १०२ कर्म विज्ञान : भाग ५ : कर्मबन्ध की विशेष दशाएँ अशुभफलदायक, दुःखदायक एवं दौर्भाग्यवर्द्धक होते हैं। शुभ कृत्यों से शुभ कर्मबन्ध और अशुभकृत्यों से अशुभ कर्मबन्ध होता है, जिसका फल देर-सबेर मिलता ही है । अत: कर्मबन्ध के समय व्यक्ति चाहे तो अशुभकर्मों से बच सकता है, जहाँ तक हो सके शुद्ध परिणामों से केवल निर्जरार्थ, कर्मक्षयार्थ शुद्ध निःस्वार्थ प्रवृत्ति करे, यदि वैसा न हो सके तो अशुभ कर्मबन्ध से तो बचे । यदि अज्ञानवश अशुभकर्मबन्ध विवशतापूर्वक हो ही गया हो तो उसके लिए पश्चात्ताप, प्रायश्चित्त आदि द्वारा उसे शिथिल करे या उदात्तीकरण द्वारा उसे शुभ की ओर मोड़ दे । यहीं बन्ध अवस्था की प्रेरणा है । (२) कर्मबन्ध की द्वितीय अवस्था : सत्ता या सत्त्व आत्मा के द्वारा योग और कषायभाव से आकर्षित द्रव्यकर्म-समूह उसके उदयकालपर्यन्त आत्मा के साथ एक क्षेत्रावगाहरूप से अवस्थित रहते हैं । यह कर्मबन्ध की अनुदय स्थिति है । कर्मबन्ध होने के बाद जब तक उदय में नहीं आता, तब तक सत्ता में (In the Potential state) रहता है। अर्थात् उतने काल तक बंधे हुए वे कर्म फल देने को तत्पर नहीं होते। उस कर्मबन्ध की फलदानशक्ति सुषुप्तावस्था में रहती है। अर्थात्-उक्त कर्मसमूह की शक्ति (Static energy) स्थिररूप से सिर्फ फल प्रदान के काल की प्रतीक्षा में निश्चेष्ट पड़ी रहती है। सत्ता कर्मबन्ध की द्वितीय अवस्था है। सत्ता का अर्थ अस्तित्व या विद्यमानता ( मौजूदगी) है। कर्मबन्ध से फलप्राप्ति के बीच की अवस्था सत्ता कहलाती है। इसका फलितार्थ है- पूर्व-संचित कर्म का आत्मा में अवस्थित रहना 'सत्ता' है। सत्ता जीव के लिए बाधक नहीं होती; क्योंकि उदय में आए बिना उसका कोई फल नहीं मिलता। अतः सुख-दुःख का कारण उदय है, सत्ता नहीं । सत्ता का कार्य बद्धकर्म तुरंत अपना फल नहीं दे देते, कुछ समय बाद ही उनका फल मिलता है। बद्धकर्म तुरंत ही फल न देकर तब तक सत्ता में पड़े रहते हैं, यानी आत्मा के साथ केवल अस्तित्व रूप में रहते हैं, जब तक कि उनका विपाक (पाचन - फलदान का समय परिपक्व) नहीं होता । बंधे हुए कर्म जितने समय तक सत्तारूप से रहते हैं, उतने समय को 'अबाधाकाल' कहते हैं। जैसे शराब पीते ही वह तुरंत अपना असर नहीं करती, किन्तु कुछ देर बाद ही असर करती है। वैसे ही कर्म भी बंधने के कुछ अर्से तक सत्ता में पड़ा रहता है। जैसे- किसी ने एक महीने बाद की ट्रेन की टिकिट १. कर्मसिद्धान्त ( कन्हैयालाल लोढ़ा ) से भावांश ग्रहण, पृ. ११, १२ Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.004246
Book TitleKarm Vignan Part 05
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDevendramuni
PublisherTarak Guru Jain Granthalay
Publication Year
Total Pages614
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size11 MB
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