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________________ योग शास्त्र मंत्रियों ने श्री राम से पूछा, कि आप जा रहे हैं, हमारे लिए क्या आदेश है ? श्री राम ने उत्तर दिया, "मुझ में तथा भरत में कोई भेद मत समझना, भरत में राम के ही दर्शन करना।" ___ भारतीय संस्कृति में यह 'शम' शाश्वत रूप से संमिश्रित रहा है । यदि परिस्थिति के प्रतिकूल होने पर क्रोध आता है या दुःख होता है, तो नवीन कर्मों का बन्धन होता है। यह 'शम' तो सम्यग्दर्शन का भी प्रथम लक्षण है । श्री कल्प सूत्र में कथन है उवसमसारं ख सामण्णं । श्रामण्य का सार उपशम है । साधना तथा साधुता का सार उपशम है। . जो उवसमइ तस्स अस्थि आराहणा। जो क्रोध को छोड़ कर उपशांत हो जाता है, वही भगवान् की दृष्टि में आराधक है । इसी उपशम की साधना से चंड कौशिक सर्प ने अपने जीवन को सार्थक किया। साध्वी मृगावती तथा चन्दन बाला इसी समता-साधना से भवपार हो गईं। जहां समता होती है, वहां पर सीमित ममता का त्याग हो जाता है और विश्व की ममता का उदय होता है । समस्त दुःखी प्राणी अपने सम्बन्धी प्रतीत होते हैं। उन के दुःख को समाप्त करने का प्रयास होता है। . ___ मोहब्बत की खुदा तक भी रसाई है। सच पूछो, तो मुहब्बत ही खुदाई है ॥ शायर ने यहां संभवतः समता या विश्व-वात्सल्य का महिमागान किया है । ऐसा अनुभव होना चाहिए, मानो सारे जहाँ का दर्द हमारे ही दिल में है।' एक आंग्ल कवि ने कहा है__Love your enemies, do good to them, that hate you. Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.004233
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashobhadravijay
PublisherVijayvallabh Mission
Publication Year
Total Pages330
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size5 MB
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