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________________ तृतीय प्रतिपत्ति - उपपात सभा का वर्णन ८७ मणिपेढियाओ जहा अभिसेयसभाए उप्पिं सीहासणं (स)अपरिवारं॥ तत्थ णं विजयस्स देवस्स सुबहु अलंकारिए भंडे संणिक्खित्ते चिट्ठइ, अलंकारिय० उप्पिं मंगलगा झया जाव (छत्ताइछत्ता) उत्तिमागारा॥ ___भावार्थ - उस बहुसमरमणीय भूमिभाग के ठीक मध्य भाग में एक बड़ी मणिपीठिका कही गई है। वह एक योजन लम्बी-चौड़ी और आधा योजन मोटी है, सर्व मणिमय और स्वच्छ है। उस मणिपीठिका के ऊपर एक बड़ा सिंहासन है। यहाँ सिंहासन का वर्णन कह देना चाहिये किंतु परिवार का कथन नहीं करना चाहिये। उस सिंहासन पर विजयदेव के अभिषेक योग्य सामग्री रखी हुई है। अभिषेक सभा के ऊपर आठ-आठ मंगल, ध्वजाएं, छत्रातिछत्र कह देने चाहिये जो उत्तम आकार के और सोलह रत्नों से शोभायमान हैं। उस अभिषेक सभा के उत्तरपूर्व (ईशानकोण) में एक विशाल अलंकार सभा है। उसका वर्णन अभिषेक सभा की तरह गोमानसिका पर्यंत कह देना चाहिये। मणिपीठिका का वर्णन भी अभिषेक सभा की तरह समझ लेना चाहिये। उस मणिपीठिका पर सपरिवार सिंहासन का कथन करना चाहिये। उस सिंहासन पर विजयदेव के अलंकार योग्य बहुत-सी सामग्री रखी हुई है। उस अलंकार सभा के ऊपर आठ-आठ मंगल, ध्वजाएं और छत्रातिछत्र हैं जो उत्तम आकार के रत्नों से शोभायमान हैं। तीसे णं अलंकारियसहाए उत्तरपुरस्थिमेणं एत्थ णं एगा महं ववसायसभा पण्णत्ता, अभिसेयसभावत्तव्वया जाव सीहासणं अपरिवारं॥ त(एोत्थ णं विजयस्स देवस्स एगे महं पोत्थयरयणे संणिक्खित्ते चिट्ठइ, तस्स णं पोत्थयरयणस्स अयमेयारूवे वण्णावासे पण्णत्ते, तंजहा-रिट्ठामईओ कंबियाओ [रययामयाइं पत्तगाइं] तवणिज्जमए दोरे णाणामणिमए गंठी (अंकमयाइं पत्ताइं) वेरुलियमए लिप्पासणे तवणिज्जमई संकला रिट्ठामए छायणे रिट्ठामया मसी वइरामई लेहणी रिट्ठामयाइं अक्खराई सम्मिए सत्थे ववसायसभाए णं-उप्पिं अट्ठट्ठमंगलगा झया छत्ताइछत्ता उत्तिमागारेइ। तीसे णं ववसायसभाए उत्तरपुरथिमेणं एगे महं बलिपेढे पण्णत्ते दो जोयणाई आयामविक्खंभेणं जोयणं बाहल्लेणं सव्वरययामए अच्छे जाव पडिरूवे॥ तस्स णं बलिपेंढस्स उत्तरपुरथिमेणं एत्थ णं एगा महं णंदापुक्खरिणी पण्णत्ता जं चेव पमाणं हरयस्स तं चेव सव्वं ॥१४०॥ ... कठिन शब्दार्थ - ववसायसभा - व्यवसाय सभा, पोत्थयरयणे - पुस्तक रत्न, कंबियाओ - कंबिका (पुढे), लिप्पासणे - मषिपात्र (दवात), मसी - स्याही, लेहणी - लेखनी, धम्मिए सत्थे - धार्मिक शास्त्र-संविधान (कानून) राष्ट्र धर्म का शास्त्र, बलिपेढे - बलिपीठ। Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.004195
Book TitleJivajivabhigama Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichand Banthiya, Parasmal Chandaliya
PublisherAkhil Bharatiya Sudharm Jain Sanskruti Rakshak Sangh
Publication Year2003
Total Pages422
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_jivajivabhigam
File Size9 MB
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