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________________ १५८ - Jain Education International संबाहिया दुक्कडो थणंति, अहो य राओ परितप्यमाणा । एगंतकूडे णरए महंते, कूडेण तत्था विसमे हया उ ॥ १८ ॥ कठिन शब्दार्थ - संबाहिया संबाधित पीड़ित किये जाते हुए, दुक्कडिणो - दुष्कृतकारीपापी, परितप्यमाणा - परितप्त होते हुए, कूडेण - गल पाश के द्वारा, विसमे विषम हया - मारे जाते हुए, तत्था - तत्स्था-वहां रहे हुए । भावार्थ - निरन्तर पीडित किये जाते हुए पापी जीव रात-दिन रोते रहते हैं । जिसमें एकान्त दुःख है तथा जो अति विस्तृत और कठिन है ऐसे नरक में पडे हुए प्राणी गले में फांसी डाल कर मारे जाते हुए केवल रुदन करते हैं । भंजंति णं पुव्वमरी सरोसं, समुग्गरे ते मुसले गहेतुं । ते भिण्णदेहा रुहिरं वमंता, ओमुद्धगा धरणितले पति ॥ १९ ॥ कठिन शब्दार्थ- पुव्वं पूर्व के, अरी शत्रु, सरोसं क्रोध युक्त, समुग्गरे मुद्गर सहित, मुसले मूसल, रुहिरं रक्त, वमंता वमन करते हुए, ओमुद्धगा - अधोमुख हो कर, धरणितले पृथ्वी पर, पडंति - गिर जाते हैं । भावार्थ - परमाधार्मिक पहले के शत्रु के समान हाथ में मुद्गर और मूसल लेकर उनके प्रहार से नैरयिक जीवों के शरीर को चूर चूर कर देते हैं । गाढ प्रहार पाये हुए और मुख से रुधिर का वमन करते हुए नैरयिक जीव, अधोमुख होकर पृथिवी पर गिर जाते हैं । 1 अणासिया णाम महासियाला, पागब्भिणो तत्थ सयावकोवा । श्री सूयगडांग सूत्र श्रुतस्कन्ध १ - - - 00000000000000 - - - खज्जति तत्था बहुकूर-कम्मा, अदूरगा संकलियाहि बद्धा ॥ २० ॥ कठिन शब्दार्थ - अणासिया अनशिता- क्षुधातुर, महासियाला महाकाय श्रृगाल, पागभणो - ढीठ, सया सदा अवकोवा क्रोधित रहने वाले, अदूरगा अदूर- निकट में स्थित, सांकलियाहि- सांकलों - जजीरों से, बद्धा - बंधे हुए । भावार्थ - उस नरक में सदैव क्रोधित, बडे ढीठ, विशाल शरीर वाले भूखे गीदड़ रहते हैं । वे, जंजीर से बंधे हुए तथा निकट में स्थित पापी जीवों को खाते हैं । सयाजला णाम णदी भिदुग्गा, पविज्जलं लोहविलीण- तत्ता । सि भिदुग्गंसि पवज्जमाणा, एगायताणुक्क्रमणं करेंति ॥ २१ ॥ 0000000000000 - For Personal & Private Use Only - - www.jainelibrary.org
SR No.004188
Book TitleSuyagadanga Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichand Banthiya, Parasmal Chandaliya
PublisherAkhil Bharatiya Sudharm Jain Sanskruti Rakshak Sangh
Publication Year2007
Total Pages338
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size7 MB
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