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________________ आगम (१४) “जीवाजीवाभिगम" - उपांगसूत्र-३ (मूलं+वृत्ति:) प्रतिपत्ति : [३], --------- ------------ उद्देशक: [(द्विप्-समुद्र)], ------ -------- मूलं [१५९] + गाथा मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित...........आगमसूत्र - [१४], उपांग सूत्र - [३] "जीवाजीवाभिगम" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीत वृत्ति: प्रत सूत्रांक [१५९] श्रीजीवाजीवाभि० मलयगिरीयावृत्तिः ३ प्रतिपत्तौ | वेलन्धरावासादिः उद्देशः२ सू०१५९ % गाथा % लीसं जोयणसहस्साई एत्थ णं संखस्स वेलंधर संखे णाम आवासपव्वते तं चेव पमाणं णवरं सब्वरयणामए अच्छे । से णं एगाए पउमवरवेदिवाए एगेण य वणसंडेणं जाव अट्ठो बहओ खुडाखुडिआओजाव घट्टई उप्पलाई संखाभाई संखवण्णाई संखवण्णाभाई संखे एस्थ देवे महिडीए जाब रायहाणीए पचत्थिमेणं संखस्स आवासपब्वयस्स संखा नाम रायहाणी तं चेव पमाणं ।। कहि भंते! मणोसिलकस्स वेलंधरणागरायस्स उदगसीमाए णामं आवासपब्बते पपणत्ते?, गोयमा! जंबुद्दीवे २ मंदरस्स उत्तरेणं लवणसमुई वायालीसं जोयणसहस्साई ओगाहिता एस्थ णं मणोसिलगस्स वेलंधरणागरायस्स उदगसीमाए णामं आवासपब्बते पण्णत्ते तं चेव पमाणं णवरि सम्यफलिहामए अच्छे जाव अट्ठो, गोयमा! दगसीमंते णं आवासपचते सीतासीतोदगाणं महाणदीणं तस्थ गतो सोए पडिहम्मति से तेण?णं जाव णिचे मणोसिंलए एत्थ देवे महिहीए जाव से णं तत्थ चाउण्हं सामाणिय. जाव विहरति ।। कहि ण भंते! मणोसिलगस्स वेलंधरणागरायस्स मणोसिला णाम रायहाणी?, गोयमा! दगसीमस्स आवासपब्वयस्स उत्तरेणं तिरि० अण्णमि लवणे एस्थ णं मलोसिलिया णाम रायहाणी पण्णत्ता तं चेव पमाणं जाव मणोसिलाए देवे-कणकरययफालियमया य वेलंधराणमावासा । अणुवेलंधरराईण पचया होति रयणमया ॥१॥ (सू०१५९) दीप अनुक्रम [२०५-२०६] 56-%95% 9 Elcumini अत्र मूल-संपादने शिर्षक-स्थाने एका स्खलना वर्तते-द्विप्-समुद्राधिकारः एक एव वर्तते, तत् कारणात् उद्देश:- २' अत्र २ इति निरर्थकम् ~623~
SR No.004114
Book TitleAagam 14 JIVAJIVABHIGAM Moolam evam Vrutti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDeepratnasagar
Publication Year2014
Total Pages938
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_jivajivabhigam
File Size230 MB
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