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________________ आगम “औपपातिक” - उपांगसूत्र-१ (मूलं+वृत्ति:) (१२) -------- मूल [३१...] मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित...........आगमसूत्र - [१२], उपांग सूत्र - [१] "औपपातिक" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचित वृत्ति: औपपा- जेणेव अणसाला तिकम् प्रत सूत्रांक [३१] H६४॥ दीप अनुक्रम 25-450-54- तए णं से कूणिए राया भभसारपुत्ते बलवाउअस्स अंतिए एअमटुं सोचा णिसम्म हड्तुजावहिअएकोणिक. जेणेव अट्टणसाला तेणेव उवागच्छद २त्ता अट्टणसालं अणुपविसहरसा अणेगवायामजोग्गवग्गणवामह-या णमल्लजुद्धकरणेहिं संते परिस्संते सयपागसहस्सपागेहिं सुगंधतेल्लमाइएहिं दप्पणिज्जेहिं मयणिज्जेहिं विंह-131 है णिज्जेहिं सविदियगायपल्हायणिज्जेहिं अभिगेहिं अभिगिए समाणे तेल्लचम्मंसि पडिपुषणपाणिपायमुकुमालकोमलतलेहिं पुरिसेहिं छेएहिं दक्खेहिं पत्तद्देहिं कुसलेहिं मेहावीहिं निउणसिप्पोवगएहिं अभिगणपरिमद्दणुवलणकरणगुणणिम्माएहिं अधिसुहाए मंससुहाए तथासुहाए रोममुहाए चउब्बिहाए संवाहणाए संचाहिए समाणे अवगयखेअपरिस्समे अट्टणसालाउ पडिणिक्खमइ पडिणिक्वमित्ता जेणेव मजणधरे तेणेव उवागच्छह तेणेव उवागच्छित्ता मजणघरं अणुपविसइ २त्ता समुत्तजालाउलाभिरामे विचित्तमणिरयणकुहिमतले रमणिजे पहाणमंडवंसि णाणामणिरयणभत्तिचित्तंसि पहाणपीटंसि सुहणिसपणे सुद्धोदएहिं गंधोदपहिं पुष्फोदएहिं सुहोदपहिं पुणो २ कल्लाणगपवरमजणविहीए मजिए तत्थ कोउअसएहिं बहुवि-14 आहेहिं कल्याणगपवरमजणावसाणे पम्हलसुकुमालगंधकासाइयलूहिअंगे सरससुरहिगोसीसचंदणाणुलित्तगये। अयसुमहग्यदूसरयणसुसंखुए सुइमालावणगविलेवेण आविद्धमणिसुवपणे कप्पियहारहारतिसरयपा-| लंबपलबमाणकडिसुत्तसुकयसोभे पिणद्धगेविज अंगुलिजगललियंगयललियकयाभरणे वरकडगतुडियर्थभिअभुए अहियरूवसस्सिरीए मुदिआपिंगलंगुलिए कुंडलउजोविआणणे मउडदित्तसिरए हारोस्थषसुकपर-12 [३१] - FaPranaamaan unsony | कोणिक-राज्ञः भगवत् महावीरस्य वन्दनार्थे गमन-यात्राया: विशद-वर्णनं ~131~
SR No.004112
Book TitleAagam 12 AUPAPAATIK Moolam evam Vrutti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDeepratnasagar
Publication Year2014
Total Pages244
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_aupapatik
File Size53 MB
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