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________________ ऊर्ध्वलोक-देवनिकाय १९७ होते हैं । इनके पर्याप्त और अपर्याप्त भेद करने पर देवों के कुल १९८ भेद आगम वचन - सोहम्मीसाणेसु देवा केरिसए कामभोगे पच्चुणुभवमाणा विहरंति? गोयमा! इट्ठा सदा इट्ठा रूवा जाव फासा एवं जाव गेवेज्जा अणुत्तरोववातिया णं अणुत्तरा सहा एवं जाव अणुत्तरा फासा । - जीवाभिगम, प्रतिपत्ति ,३ उ. २, सू. २१९ - प्रज्ञापना, पद २, देवाधिकार ..महिड् िढया महज्जुइया जाव महाणु भागा इड् ढीए पण्णत्ते, जाव अचुओ, गेवेज्जुणुत्तरा या सव्वे महिड्ढीया... - जीवाभिगम, प्रतिपत्ति, ३ सू. २१७, वैमानिकाधिकार (सौधर्म तथा ईशान कल्पों में देव कैसे-कैसे काम-भोगों को भोगते हुए विहार करते हैं ? ... गौतम ! वह इष्ट शब्द, इष्ट रूप, इष्ट गन्ध, इष्ट रस और इष्ट स्पर्श का ग्रैवेयक तक तथा अनुत्तरोपप्रातिक देव उससे भी उत्कृष्ट शब्द आदि के सुख का आनन्द लेते हैं । अच्युत स्वर्ग तक वह महानुभाग, महान ऋद्धिवाले, महान कांति वाले होते हैं । ग्रैवेयक और अनुत्तर विमानवासी देव उनसे भी महान ऋद्धि वाले होते हैं । अधिकता और हीनता सम्बन्धी विषयों का निरूपण - स्थितिप्रभावसुखयु तिलेश्याविशुद्धीन्द्रियावधिविषयतोऽधिकाः ।२१ । गतिशरीरपरिग हाभिमानतो हीना ।२२। (कल्पोपपन्न और कंल्पातीत देवों में) स्थिति, प्रभाव, सुख, द्युति, लेश्याविशुद्धि, इन्द्रियविषय और अवधिज्ञानविषय -यह सात बातें उत्तरोत्तर अधिक होती हैं । गति, शरीर, परिग्रह (ऐश्यर्य), अभिमान (अपनी विभूति का अहंकार) क्रमशः हीन (कम) होते हैं । विवेचन - देवों की स्थिति, सुख आदि सम्बन्धी दोनों सूत्र कल्पोपपन्न और कल्पातीत देवों की अपेक्षा से हैं । Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.004098
Book TitleTattvartha Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKevalmuni, Shreechand Surana
PublisherKamla Sadhanodaya Trust
Publication Year2005
Total Pages504
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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