SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 306
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ - दसवां चरम पद - परमाणु पुद्गल आदि के चरम अचरम २९३ रूप में बताया गया है। उन्हीं अंकों के पास में लिखे हुए काले वर्ण के अंकों ®२ आदि को 'लोक के चरम प्रदेशों' के रूप म लाया गया है। द्वितीय परिक्षेप के आकाश प्रदेशों पर लिखे हुए अंग्रेजी वर्णमाला के अंकों (1, 2....) को 'अलोक के चरम द्रव्यों के रूप में बताया गया है। उन्हीं अंकों के पास में लिखे हुए हल्के वर्ण के अंकों क्रमश: १, २, ३ आदि को 'अलोक के चरम प्रदेशों' के रूप में बताया गया है। उपर्युक्त चित्र में एक छोटे से प्रतर (८४ प्रदेशी) द्वारा लोक व अलोक के चरम द्रव्यों व प्रदेशों को बताने का प्रयास किया गया है। बहुत छोटा (कम प्रदेशों वाला) प्रतर होने से इसमें चरम द्रव्यों से चरम प्रदेश विशेषाधिक ही होते हैं। यदि प्रतर क्रमशः बड़ा-बड़ा संख्यात प्रदेशों का होने पर संख्यात गुणा का तथा असंख्यात प्रदेशों का प्रतर होने पर असंख्यात गुणा का फर्क हो जाता है। लोक का छोटे से छोटा (क्षुल्लक) प्रतर भी असंख्यात प्रदेशों का ही होने से उसमें तो चरम द्रव्यों से चरम प्रदेश असंख्यातगुणा होने में कोई बाधा नहीं है। अलोक का छोटे से छोटा प्रतर (क्षुल्लक प्रतर का बाद्य परिक्षेप) भी लोक के लघु प्रतर से विशेषाधिक प्रदेशों वाला होने से उसमें तो चरम द्रव्यों से चरम प्रदेश असंख्यातगुणा होना सुस्पष्ट ही है। परमाणु पुद्गल आदि के चरम अचम ___ परमाणु पोग्गले णं भंते! किं चरिमे १, अचरिमे २, अवत्तव्वए ३, चरिमाइं ४, अचरिमाइं ५, अवत्तव्वयाइं ६, उदाहु चरिमे य अचरिमे य ७, उदाहु चरिमे य अचरिमाइं ८, उदाहु चरिमाइं अचरिमे य ९, उदाहु चरिमाइं च अचरिमाइं च १०, पढमा चउभंगी। .. भावार्थ - प्रश्न - हे भगवन् ! परमाणु पुद्गल क्या १. चरम हैं ? २. अचरम हैं ? ३. अवक्तव्य हैं ? ४. अथवा बहुवचनान्त अनेक चरम रूप हैं ? ५. अनेक अचरम रूप हैं ? ६. बहुत अवक्तव्य रूप हैं ? अथवा ७. चरम और अचरम हैं ? ८. या एक चरम और अनेक अचरम रूप हैं ? ९. अथवा अनेक चरम रूप और एक अचरम हैं ? १०. या अनेक चरम रूप और अनेक अचरम रूप हैं ? यह प्रथम चौभंगी हुई॥१॥ उदाहु चरिमे य अवत्तव्वए य ११, उदाहु चरिमे य अवत्तव्वयाइं च १२, उदाहु चरिमाइंच अवत्तव्वए य १३, उदाहु चरिमाइंच अवत्तव्वयाइंच १४, बीया चउभंगी। भावार्थ - अथवा क्या परमाणु पुद्गल ११. चरम और अवक्तव्य रूप हैं ? १२. अथवा एक चरम और बहुत अवक्तव्य रूप हैं ? या १३. अनेक चरम रूप और एक अवक्तव्य रूप हैं? अथवा १४. अनेक चरम रूप और अनेक अवक्तव्य रूप हैं ? यह दूसरी चौभंगी हुई॥२॥ Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.004094
Book TitlePragnapana Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichand Banthiya, Parasmal Chandaliya
PublisherAkhil Bharatiya Sudharm Jain Sanskruti Rakshak Sangh
Publication Year2008
Total Pages414
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_pragyapana
File Size9 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy