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________________ २४०४ भगवता सूत्र-श. १५ व्यापारियों की दुर्दशा का दृष्टांत ऊँच, नीच और मध्यम कुलों में गोचरी के लिये चले । वे हालाहला कुम्भारिन की दूकान के समीप होकर जा रहे थे कि गोशालक ने आनन्द स्थविर को देखा। गोशालक ने स्थविर को सम्बोधित कर कहा-“हे आनन्द ! यहाँ आ और मेरे एक दृष्टांत को सुन।" गोशालक से सम्बोधित होकर आनन्द स्थविर, हालाहला ... कुम्भारिन की दूकान में गोशालक के पास आये। तएणं से गोसाले मंलिपुत्ते आणंदं थेरं एवं वयासी-“एवं खलु आणंदा ! इओ चिराईयाए अद्धाए केइ उच्चावया वणिया अत्थत्थी, अत्थलुद्धा, अत्थगवेसी, अस्थकंखिया. अत्थपिवासा अस्थगवेसणयाए णाणाविहविउलपणियभंडमायाए मगडीसागडेणं सुबह भत्तपाणं पत्थयणं गहाय एगं महं अगामियं, अणोहियं छिण्णावायं दीहमद, अडविं अणुप्पविट्ठा । तपणं तेसिं वणियाणं तीसे अगामिल याए, अणोहियाए, छिण्णावायाए. दीहमद्धाए अडवीए किंचि देसं अणुप्पत्ताणं समाणाणं से पुव्वगहिए उदए अणुपुव्वेणं परिभुजेमाणे परिभुजेमाणे खीणे । तएणं ते वणिया वीणोदगा समाणा तण्हाए परिभवमाणा अण्णमण्णे सद्दावेंति, अण्णमण्णे सद्दावित्ता एवं वयासी-एवं खलु देवाणुप्पिया ! अम्हं इमीसे अगामियाए जाव अडवीए किंचि देसं अणुप्पत्ताणं समाणाणं से पुव्वगहिए उदए अणुपुब्वेणं परिभुजेमाणे परिभुजेमाणे खीणे, तं सेयं खलु देवाणुः प्पिया ! अम्हं इमोसे अगामियाए जाव अडवीए उदगस्स सवओ Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.004090
Book TitleBhagvati Sutra Part 05
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhevarchand Banthiya
PublisherAkhil Bharatiya Sudharm Jain Sanskruti Rakshak Sangh
Publication Year2006
Total Pages530
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_bhagwati
File Size9 MB
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