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________________ भगवती सूत्र-स. १: 3. उदायन नरेता चरित्र २२३? राजप्रश्नीय सूत्रानुसार यावत् 'कल्याण रूप फल और वृत्ति विशेष का अनुभव करते हुए रहते हैं'-तक कहना चाहिये । (वे स्थान विश्राम के लिए अस्थायी होते हैं) वहाँ वे लोग स्थायी निवाप्त नहीं करते । उनका निवास दूसरी जगह होता है । इसी प्रकार हे गौतम ! असुरेन्द्र, असुरराज चमर का चमरचञ्च नामक आवास, केवल क्रीड़ा और रति के लिए है। चमरेन्द्र वहाँ आकर क्रीड़ा और रति करता है । इसलिए हे गौतम ! ऐसा कहा गया है कि चमरेन्द्र चमरचंच आवास में निवास नहीं करता। 'हे भगवन् ! यह इसी प्रकार है, हे भगवन् ! यह इसी प्रकार है-ऐसा कहकर गौतमस्वामी यावत् विचरते हैं।' इसके बाद श्रमण भगवान् महावीर स्वामी किसी दिन राजगृह नगर और गुण-शील चैत्य से यावत् विहार कर देते है। उदायन नरेश चरित्र ४-तणं कालेणं तेणं समएणं चंपा णामं णयरी होत्था, , वण्णओ । पुण्णभद्दे चेइए, वण्णओ। तएणं समणे भगवं महावीरे अण्णया कयाइ पुव्वाणुपुलिं चरमाणे जाव विहरमाणे जेणेव चंपा णयरी जेणेव पुण्णभद्दे चेहए तेणेव उवागच्छइ, तेणेव उवागच्छित्ता जाव विहरड़ । तेणं कालेणं तेणं समएणं सिंधूसोवीरेसु जणवएसु वीतीभए णामं णयरे होत्था, वण्णओ। तस्स णं वीतीभयस्स णयरस्स बहिया उत्तरपुरच्छिमे दिसिभाए एत्थ णं मियवणे णामं उजाणे होत्था, मन्योउय० वण्णओ। तत्थ णं वीतीभए णयरे Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.004090
Book TitleBhagvati Sutra Part 05
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhevarchand Banthiya
PublisherAkhil Bharatiya Sudharm Jain Sanskruti Rakshak Sangh
Publication Year2006
Total Pages530
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_bhagwati
File Size9 MB
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