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________________ २०७६ भगवती मूत्र- ग. १२ उ. ७ जीवों का अनंत जन्म-मरण पहले उत्पन्न हो चुका है ? ६ उत्तर-हां, गौतम ! जिस प्रकार रत्नप्रभा के दो आलापक कहे हैं, उसी प्रकार शर्कराप्रभा के भी दो आलापक (एक जीव और सभी जीव के) कहने चाहिये । इसी प्रकार यावत् धून प्रभा तक कहना चाहिये । ७ प्रश्न-हे भगवन् ! यह जीव, तमःप्रभा पृथ्वी के पांच कम एक लाख नरकावासों में से प्रत्येक नरकावास में पूर्ववत् उत्पन्न हो चुका है ? ७ उत्तर-हाँ, गौतम ! पूर्ववत् उत्पन्न हो चुका है। ८ प्रश्न-हे भगवन् ! यह जीव, अधःसप्तम पृथ्वी के पांच अनुत्तर और अति विशाल नरकावासों में से प्रत्येक नरकावास में पूर्ववत् उत्पन्न हो चुका है ? ८ उत्तर-हाँ, गौतम ! रत्नप्रभा पृथ्वी के समान हो चुका है। ९ प्रश्न-हे भगवन् ! यह जीव, असुरकुमारों के चौसठ लाख असुरकुमारावासों में से प्रत्येक असुरकुमारावास में, पृथ्वोकायिकपने यावत् वनस्पतिकायिकपने, देवपने, देवीपने, आसन, शयन, पात्रादि उपकरण के रूप में पहले उत्पन्न हो चुका है ? ९ उत्तर-हां, गौतम ! अनेक बार या अनन्तबार उत्पन्न हो चुका है। सभी जीवों के विषय में भी इसी प्रकार जानना चाहिये । इसी प्रकार स्तनितकुमारों तक जानना चाहिये। किन्तु उनके आवासों की संख्या में भेद है । वह संख्या पहले बताई गई है। १० प्रश्न-अयं णं भंते ! जीवे असंखेज्जेसु पुढविक्काइया. वाससयसहस्सेसु एगमेगंसि पुढविकाइयावासंसि पुढविकाइयत्ताए जाव वणस्सइकाइयत्ताए उववण्णपुव्वे ? ___ १० उत्तर-हंता गोयमा ! जाव अणंतखुत्तो। एवं सम्वजीवा वि, एवं जाव वणस्सइकाइएसु । Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.004089
Book TitleBhagvati Sutra Part 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhevarchand Banthiya
PublisherAkhil Bharatiya Sudharm Jain Sanskruti Rakshak Sangh
Publication Year2006
Total Pages578
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_bhagwati
File Size10 MB
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