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________________ ४१० भगवती सूत्र-श. २ उ. १ आर्य स्कन्दक-सिद्धस्वरूप.. १ दव्वओ णं एगे सिद्धे सअंते, २ खेत्तओ णं सिद्धे असंखेजपएसिए, असंखेजपएसोगाढे अस्थि पुण से अंते, ३ कालओ णं सिद्धे सादीए अपजवसिए, णत्थि पुण से अंते, ४ भावओ णं सिद्धे अणंता णाणपजवा, अणंता दंसणपजवा, अणंता अगरुयलहुयपजवा, नत्थि पुण से अंते; सेत्तं दव्वओ णं सिद्धे सअंते, खेत्तओ णं सिद्धे .सअंते, कालओ णं सिद्धे अणंते, भावओ णं सिद्धे अणंते । विशेष शब्दों के अर्थ-सिद्धे--मुक्तात्मा । भावार्थ-हे स्कन्दक ! सिद्ध विषयक शंका का समाधान इस प्रकार हैहे.स्कन्दक ! मैने सिद्ध के चार भेद कहे है-१ द्रव्यसिद्ध, २ क्षेत्रसिद्ध, ३ कालसिद्ध और ४ भावसिद्ध। १ द्रव्य से-सिद्ध एक है, अन्त सहित है। २ क्षेत्र सेसिद्ध असंख्यात प्रदेश वाले हैं, असंख्यात आकाश प्रदेश अवगाहन किये हैं। अंत सहित हैं। ३ काल से सिद्ध आदि सहित हैं और अंत रहित हैं। ४ भाव से सिद्ध-अनंत ज्ञान पर्याय रूप हैं, अनंत दर्शन पर्याय रूप हैं, अनंत अगुरुलघु पर्याय रूप हैं, अंत रहित हैं । अर्थात् द्रव्य से और क्षेत्र से सिद्ध अंत वाले हैं तथा काल से और भाव से सिद्ध अंत रहित हैं। इसलिए हे स्कंदक ! सिद्ध अंत सहित भी हैं और अंत रहित भी हैं। विवेचन-सिद्ध-मुक्तात्मा, परम विशुद्ध परमात्मा । ये सभी निज आत्म द्रव्य की अपेक्षा एक एवं सान्त है, किन्तु समूहापेक्षा अनन्त हैं। एक वनस्पतिकाय के अतिरिक्त शेष त्रस और स्थावर जीवों से भी अनन्तगुण । इतने सिद्ध भगवान् हैं । जे वि य ते खंदया ! इमेयारूवे अज्झथिए चिंतिए जावसमुप्पज्जित्था-केण वा मरणेणं मरमाणे जीवे वढइ वा हायइ Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.004086
Book TitleBhagvati Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhevarchand Banthiya
PublisherAkhil Bharatiya Sudharm Jain Sanskruti Rakshak Sangh
Publication Year2008
Total Pages552
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_bhagwati
File Size9 MB
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