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________________ षड्दर्शन समुच्चय भाग - १, परिशिष्ट-८, व्याख्या की शैली का परिचय वस्तुओ में से जिसकी प्रारंभ से आवश्यकता है। उसका निरुपण करने के लिए "तेन” शब्द से शुरुआत करते हुए देखने को मिलते है । विशेषलक्षणं सामान्यलक्षणाविनाभावि, सामान्यलक्षणं च विशेषलक्षणाविनाभावि सामान्यविशेषलक्षणयोरन्योन्यापरिहारेण स्थितत्वात् 1 तेन प्रमाणविशेषलक्षणस्यादौ प्रमाणसामान्यलक्षणं सर्वत्र वक्तव्यम् अतोऽत्रापि प्रथमं तदभिधीयते । (२०) एक विषय का निरुपण करते करते जो निष्कर्ष के उपर आकर खडा होता है । वहां दूसरी कुछ अनुपपत्तिओ का परिहार हो जाता है और अन्य दर्शन की मान्याताओ का निराकरण भी हो जाता है ऐसे स्थान पे टीकाकार श्री अंतिम निष्कर्ष का निवेदन करके "एतेन" कहकर अन्य मत का खंडन भी यह हमारे आगे के निरुपण से हो जाता है। ऐसा प्रतीत करवाते होते है । ५७७ ततो भवत्येव स्त्रीणां मोक्ष इति स्थिते मोक्षतत्त्वम् । एतेन ज्ञानिनो धर्मतीर्थस्य कर्तारः परमं पदम् । गत्वागच्छन्ति भूयोऽपि भवे तीर्थनिकारतः ||१|| इति परपरिकल्पितं पराकृतम् । (श्लो. ५२ टीका) (२१) किसी भी बात की पेशकश चलती हो तब अंतिम फलितार्थ देना हो तब टीकाकार "अनेन"... कहकर नीचे की शीलै से पेश करते होते है । अनेन सम्यक्त्वज्ञानसद्भाव एव चारित्रं नान्यथेत्यावेदितं द्रष्टव्यम् । (श्लो. ५३ टीका) (२२) उत्तरपक्षकार अथवा मूल पेशी करनेवाले अपने मत की पेशी करते करते बीच आती असंगतियों की दूर करने के लिए अपनी मान्यता को ज्यादा स्पष्ट करने के लिए या अन्य प्रतिवादी की इस विषय के अनुरुप विपरीत मान्यता के खंडन के लिए नीचे की शैली का उपयोग करते होते है । न च यदेव पक्षधर्मस्य सपक्ष एव सत्त्वं तदेव विपक्षात्सर्वतो व्यावृत्तत्वमिति वाच्यं अन्वयव्यतिरेकयोर्भावाभावरुपयोः सर्वथा तादात्म्ययोगात् । (यहां न और इति वाच्यं के बीच पूर्वपक्षकार की बात या उपर बताई गई बातो में से किसी एक को पेश करते होते है । इति न वाच्यं ये शब्द उत्तरपक्षकार के होते है । अर्थात् पूर्वपक्षकार को इस अनुसार से नहीं कहना चाहिए । उसके बाद उसका निराकरण बताते होते है । कारणनिर्देशक पंक्ति के अंत में पंचमी विभक्ति का प्रयोग होता है ।) सूचना : (१) कोई बार टीकाकार " इति न वाच्यम्" के स्थान पे " इति न वक्तव्यम्" या "इति न शङ्कनीयम्” शब्दो का प्रयोग करते हुए देखने को मिलते है । (२) शंकाकार को प्राय: शंका नहीं करने की नम्र सूचना करनी हो तब समाधानकार= उत्तरपक्षकार “न शंकनीयम्" ऐसे शब्दो का उच्चारण करते देखने को मिलते है । ( २३ ) कोई बार शंका की समाप्तिसूचक "इति चेत्" शब्द देखने को नहि मिलता है। तब नीचे अनुसार की शैली देखने को मिलती है । ननु कृतकत्वेन कथमनादित्वं बन्धस्य श्रद्धातुमुचितम् ? सत्यम् अतीकालसाधर्म्याद्अतिक्रान्तकालसादृश्येन । (योगाबिंदु - गाथा १२) Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.004073
Book TitleShaddarshan Samucchaya Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSanyamkirtivijay
PublisherSanmarg Prakashak
Publication Year2012
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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