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________________ ग्रन्थकार अकलङ्क ः उनके ग्रन्थ योनिप्राभृत व्याख्याप्रज्ञप्ति व्याख्याप्रज्ञप्तिदण्डक आदिका उल्लेख इसमें किया गया है, जिससे ज्ञात होता है कि अकलङ्कदेव विद्याके क्षेत्रमें अधिक से अधिक संग्राहक भी थे। इसमें वेद उपनिषद् स्मृति पुराण पाणिनिसूत्र पातञ्जलभाष्य वाक्यपदीय न्यायसूत्र वैशेषिकसूत्र जैमिनिसूत्र योगसूत्र सांख्यकारिका न्यायभाष्य व्यासभाष्य अभिधर्मकोश प्रमाणसमुच्चय सन्तानान्तरसिद्धि युक्त्यनुशासन द्वात्रिंशद्वात्रिंशतिका आदि ग्रन्थों के अवतरण पर्याप्तमात्रा में उपलब्ध होते हैं । यह अब संशोधित होकर भारतीय ज्ञानपीठसे दुबारा प्रकाशित हो गया है। T २. अष्टशती - यह समन्तभद्रकृत आप्तमीमांसा अपरनाम देवागमस्तोत्रकी संक्षिप्त वृत्ति है। जैनदर्शन ग्रन्थोंमें आतमीमांसाका विशिष्ट गौरवपूर्ण स्थान है । इसमें अनेकान्त और सप्तभंगीका अच्छा विवेचन है । इसका परिमाण ८०० श्लोक प्रमाण होनेसे इसे अष्टशती कहा जाता है । इसपर विद्यानन्द आचार्यकी अष्टसहस्री टीका है । जो सुवर्ण में मणिकी तरह आगे-पीछेके व्याख्यावाक्यों में अष्टशतीको जड़ती चली जाती है । विद्यानन्दने अपनी उस अष्टशतीगर्भित अष्टसहस्री में लिखा है कि यह अष्टसहस्री कष्टसहस्री से बन पाई है और इसीलिए वे गर्वसे कहते हैं कि - 'श्रोतव्या अष्टसहस्री श्रुतैः किमन्यैः सहस्रसंख्यानैः ।'इसमें यह विशेषता अकलङ्कके सूक्तरत्न को सुवर्णालंकृत करनेके कारण आई है । इसमें मूल आतमीमांसामें आये हुए सदेकान्त असदेकान्त भेदैकान्त अभेदैकान्त नित्यैकान्त क्षणिककान्त अपेक्षैकान्त अनपेक्षैकान्त युक्तत्येकान्त अन्तरङ्गार्थतैकान्त बहिरङ्गार्थतैकान्त देवैकान्त और पौरुषैकान्त आदि एकान्तोंकी आलोचना कर पुण्य-पापबन्धकी चरचा की है। इन सब एकान्तोंकी आलोचनाके प्रसङ्गमें अष्टशतीमें उन-उन एकान्तवादियोंके मन्तव्य पूर्वपक्ष में साधार उपस्थित किये गये हैं । सर्वप्रथम अकलङ्कदेवने आज्ञाप्रधानियों के देवागम और आकाशगमन आदिके द्वारा आप्तके महत्त्वख्यापनकी प्रणालीकी आलोचना कर आप्तमीमांसा के आधारसे ही बीतराग सर्वज्ञको आप्त सिद्ध कर उसे युक्ति और आगमसे अविरोधी वचनवाला सिद्ध किया है । इसी सिलसिले में अन्य आप्तोंके एकान्तवादोंकी आलोचना चालू हुई है । अन्तमें प्रमाण और नयकी चरचा आई है । अकलङ्कदेवने प्रमाण नय और दुर्नयकी सटीक परिभाषा इसमें की है' " [ प्रमाणात् ] तदतत्प्रतिपत्तेः [नयात् ] तत्प्रतिपत्तेः [दुर्णयात् ] तदन्यनिराकृतेश्व ।” अर्थात् प्रमाणविवक्षित और अविवक्षित सभीको जानता है, नयसे विवक्षितकी प्रतिपत्ति होती है तथा दुर्णय अविवक्षितका निराकरण कर देता है । इसमें जयपराजयव्यवस्था बताई है तथा चित्राद्वैत संवेदनाद्वैत और शून्याद्वैत आदि वादोंकी बड़ी मार्मिक आलोचना की गई है । ५७ ३. लघीयस्त्रय सविवृति लघीयस्त्रय नामसे ज्ञात होता है कि यह छोटे-छोटे तीन प्रकरणोंका संग्रह है । लघीयस्त्रय स्वविवृतिकी प्रतियों में इसके प्रमाणप्रवेश और नयप्रवेशको एक ग्रन्थके रूपमें माना है तथा प्रवचनप्रवेशको जुदा; क्योंकि उसमें पृथक् मंगलाचरण किया गया है और नय-प्रवेश के विषयोंको दुहराया है । विवृतिकी प्रतिमें 'इति प्रमाणनय प्रवेशः समाप्तः । कृतिरियं सकलवादिचक्रचक्रवर्तिनो भट्टाकलङ्कदेवस्य' यह पुष्पिकावाक्य दिया है। इससे ज्ञात होता है कि अकलङ्कदेवने प्रथम दिग्नागके न्यायप्रवेशकी तरह जैनन्यायमें प्रवेश कराने के लिए प्रमाणनयप्रवेश बनाया था । पीछे या तो स्वयं अकलङ्कदेवने या फिर सिद्धिविनिश्चयटीकाकार अनन्तवीर्यने तीनों प्रकरणोंकी लघीयस्त्रय संज्ञा रखी है; इसका कारण यह ज्ञात होता है कि अनन्तवीर्य नयप्रवेशक प्रकरणको स्वतन्त्र मानते थे और इसीलिये उन्हें तीनों प्रकरणों को लघीयस्त्रय संज्ञा देनेकीं सूझी हो । अस्तु, (१) अष्टश०, अष्टसह० पृ० २९१ । (३) अकलङ्कग्र० प्रस्ता० पृ० ३४ । ८ Jain Education International (२) अकलङ्कग्रन्थत्रय, लघी० पृ० १७ । For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.004038
Book TitleSiddhi Vinischay Tika Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnantviryacharya
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1944
Total Pages686
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
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