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________________ ३८६ आनन्द प्रवचन : भाग १० शास्त्रपाठक ने फिर कहा-'भीष्म उवाच' इतने में तो गोमती ने रसोईघर के पास बिल्ली देखी । झटपट उठकर 'छिरि-छिरि' कहते हुए बिल्ली भगाई । फिर रसोइये पर रुष्ट होकर उसे डाँटने लगी। वहाँ से आकर फिर शास्त्र सुनने बैठी। शास्त्रपाठक फिर बोला-'भीष्म उवाच'। इसी दौरान बछड़ा खुल गया। उसे देखकर गोमती दौड़ी और जोर-जोर से चिल्लाने लगी-अरे, बछड़ा खुल गया है। फिर बछड़े के पालक पर रोष किया और पुनः आकर सुनने बैठी। शास्त्रपाठक का 'भीष्म उवाच' कहना था कि कौए कांव-काव करने लगे। इसलिए वहीं से मुंह टेढ़ा करके नौकर को डाँटने लगी। बीच-बीच में फिर कोई याचक आ जाता तो गोमती बार-बार उठती रही। यों शास्त्रवाचन का एक पहर पूरा हो गया। __ अतः शास्त्रपाठक अपने घर गया । फिर दूसरे दिने प्रातः शास्त्रपाठक आया, तब भी सेठानी की सुनने की वही पुरानी रीति रही। कान सुनने में रहते, पर मन कहीं और रहता, आँखें कहीं और दौड़तीं। बेचारा शास्त्रपाठक सुनाते-सुनाते थक गया, परन्तु गोमती सेठानी के पल्ले कुछ भी न पड़ा, न उसके जीवन में कोई परिवर्तन आया । आत्मा वही पुरानी पापिन रही। भला ऐसे अनवस्थित-दत्तावधानरहित व्यक्ति की आत्मा धर्म-श्रवण न करने तथा अधर्मपथ को न छोड़ सकने के कारण उसकी शत्रु ही तो बनेगी ?" वास्तव में पठन-पाठन या श्रवणादि कोई भी कार्य मनोयोगपूर्वक न करने से आत्मा में कोई सुधार या विकास नहीं हो सकता। जो व्यक्ति परमात्मा (शुद्ध आत्मा) से ध्यान हटाकर विषय-विकारों में, सांसारिक प्रपंचों में लगाता है, उसकी आत्मा भी अनवस्थित कहलाती है। परमात्मा से ध्यान हटाकर विषय-वासनाओं या सांसारिक राग-द्वेषमय प्रपंचों में लगाने से व्यक्ति का जीवन पतन की ओर जाता है, उसकी आत्मा स्थानभ्रष्ट होकर नाना कर्मबन्धनों से जकड़ जाती है, फिर उनका दुःखद फल उसी आत्मा को भोगना पड़ता है। यही तो आत्मा की आत्मा के साथ शत्रुता है । जो व्यक्ति परमात्मा में अपना चित्त इतना एकाग्र कर लेता है कि अपने आस-पास के घटनाचक्र की ओर उसका बिलकुल ध्यान नहीं जाता, वही अपनी आत्मा को अवस्थित एवं मित्र बनाता है । हजरत गोश नामक एक मुस्लिम महात्मा बहुत प्रसिद्ध हो गए हैं । उनके पड़ोस में एक द्वेषी मनुष्य रहता था। जब 'हजरत गोश' नमाज पढ़ते थे, तब वह उनके नमाज पढ़ने में विघ्न डालने के लिए जोर-शोर से किसी-न-किसी प्रकार की आवाज किया करता था। . जब यह सिलसिला प्रतिदिन चलने लगा, तब एक दिन उनके एक शिष्य ने उनसे कहा--"हजरत ! अपने इस पड़ोसी को आप क्यों नहीं कुछ कहते ?" हजरत गोश ने पूछा-"क्यों भाई ! इसने मेरा क्या बिगाड़ा है ?" शिष्य बोला- "जब Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.004013
Book TitleAnand Pravachan Part 10
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnand Rushi, Shreechand Surana
PublisherRatna Jain Pustakalaya
Publication Year1980
Total Pages430
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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