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________________ ब्रह्मचारी विभूषारहित सोहता २८७ यह बाह्य-सौन्दर्य कितना क्षण-भंगुर है ! जिस बाह्य सौन्दर्य पर वर्तमान युग का युवक-युवतीवर्ग इतराता है, उस सौन्दर्य के मूल स्रोत - ब्रह्मचर्य, संयम आदि को न अपनाकर, स्वास्थ्य और प्राकृतिक जीवन से दूर रहकर वह कृत्रिम सौन्दर्य प्रसाधनों से सोन्दर्य - प्राप्ति की आशा करता है, वह कितना क्षणभंगुर है । शरीर की अवस्था के ढलने के साथ ही वह ढलने लगता है, रोग के एक थपेड़े से ही वह मुर्झा जाता है, मानसिक चिन्ता के कारण वह फीका पड़ जाता है और बुढ़ापे के साथ ही अस्त होने लगता है, उस बाह्य एवं नश्वर शरीर-सौन्दयं से ब्रह्मचारी को लगाव क्यों होगा ? वह कृत्रिम, क्षणिक एवं बाह्य शरीर सौन्दर्य उसके लिए उपादेय नहीं होगा । वह उस पर आसक्त होकर अपने बहुमूल्य जीवन का अमूल्य समय, धन, शक्ति तथा धर्म को बर्बाद क्यों करेगा, उस कृत्रिम सौन्दर्य प्रसाधन में ? प्रसिद्ध पाश्चात्य साहित्यकार बेकन (Bacon ) ने इस सम्बन्ध में ठीक ही कहा है "Beauty is as summer fruits, which are easy to corrupt and cannot last and for the most part it makes a dissolute youth." 'सौन्दर्य (शारीरिक) ग्रीष्म ऋतु के फलों के समान है, जो आसानी से बिगड़ जाते हैं और अधिक टिक नहीं सकते, और अधिकांशतः यह जवानी को चरित्रभ्रष्ट कर देता है ।' वास्तव में सौन्दर्य - शाश्वत सौन्दर्य - आत्मा में है, आत्मा के ज्ञान-दर्शनचारित्रादि गुणों में है, उसके लिए आत्मशक्ति को (ब्रह्मचर्य आदि से ) बढ़ाने की जरूरत है, न कि विनश्वर बाह्य सौन्दर्य के पीछे दीवाना होने की । मथुरा की प्रसिद्ध नर्तकी वासवदत्ता, अपने बाह्य एवं नश्वर सौन्दर्य पर इठलाती थी, उसे अजर-अमर माने बैठी थी । उसे अपने इस सौन्दर्य पर गर्व था कि वह बड़े से बड़े सत्ताधीश, धनाढ्य या राजकुमार आदि को अपने इशारे पर नचा सकती है । परन्तु एक दिन उसने एक तेजस्वी और ब्रह्मचर्य से देदीप्यमान युवक उपगुप्त भिक्षु को राजपथ से गुजरते हुए देखा । उसके चेहरे पर स्वाभाविक सौन्दर्य अठखेलियाँ कर रहा था । वह सादे काषाय वस्त्रों में कृत्रिम सौन्दर्य प्रसाधनों के प्रयोग के बिना ही अतीव सुन्दर लग रहा था । उसे देखते ही वासवदत्ता मोहित हो गई । भिक्षु को प्रणयाचना पूर्ण करने हेतु आमन्त्रित करने लगी । परन्तु निःस्पृह एवं ब्रह्मचारी भिक्षु ने उसके आमन्त्रण को मानने से इन्कार कर दिया। उसने कहा"बहन ! जब उपयुक्त समय आएगा, तब मैं अवश्य तुम्हारी सेवा में आऊँगा ।" - कुछ ही अर्से बाद वासवदत्ता को एक भयंकर रोग ने आ घेरा, जिससे उसका सारा शरीर सड़ गया, उससे रक्त और मवाद चूने लगे । भयंकर दुर्गन्ध उठने लगी । वासवदत्ता का सौन्दर्य - गर्व चूर-चूर हो गया । राजा के पास शिकायतें पहुँची कि वासवदत्ता को नगर के बाहर फिकवाया जाए अन्यथा सारे नगर में यह भयंकर रोग Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.004013
Book TitleAnand Pravachan Part 10
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnand Rushi, Shreechand Surana
PublisherRatna Jain Pustakalaya
Publication Year1980
Total Pages430
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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