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________________ सत्यनिष्ठ पाता है श्री को : १ १६६ सत्य के प्रति द्रोह करके असत्याचरण करता है। परन्तु सत्यनिष्ठ मानव इन या. ऐसे ही किसी भी कारणवश असत्य का आचरण करके सत्य के प्रति द्रोह नहीं करता। वह जरा-सा भी असत्य बोलना अपनी आत्मा का अपमान करना समझता है। वह अपनी प्रत्येक प्रवृत्ति, वचन, विचार या चेष्टा पर पूरी पहरेदारी रखता है। उसमें सत्यनिष्ठता के कारण निर्भयता, साहस और अखण्डजागृति होती है। वह परिणामभीरुता को बिलकुल तिलांजलि दे देता है, और निखालिस सत्य का मन, वचन, काया से आचरण करता है। सत्यनिष्ठ अवसरवादी बनकर कभी सत्य और कभी असत्य, बोलकर दोहरे व्यक्तित्व का व्यक्ति नहीं बनता । वह जैसा है, वैसा ही दुनिया के सामने आता है, वह घर और बाहर, दूकान और मकान में अलग-अलग के रूप में नहीं आता। वह बनावट, दिखावट, सजावट को कृत्रिम और एक प्रकार से असत्यपोषक मानता है और विकारी एवं कृत्रिम सत्य को असत्य । क्योंकि उसके असत्य की परिभाषा महाभारत के अनुसार यही होती है ___"अविकारितमं सत्यं सर्ववर्णेषु भारत !" 'हे अर्जुन ! सभी वर्गों में अत्यन्त अविकारी को सत्य कहा गया है।' इसी प्रकार सत्यनिष्ठ व्यक्ति जब किसी सत्य को यथार्थतया समझकर पकड़ता है, तब यह परवाह नहीं करता है, अहा ! मेरे पुराने अन्धविश्वासों और अन्धपरम्पराओं की जड़ें उखड़ रही हैं। वह पाश्चात्य विचारक स्टापफोर्ड ए. ब्रूक (Stopford A. Brooke) के इन विचारों से पूर्णतया सहमत हो जाता है "If a thousand old beliefs were ruined in our march to truth we must still march on.” । "अगर सत्य की ओर गमन करने में हजारों पुराने अन्धविश्वास नष्ट हो जाते हैं तो हमें उनकी परवाह न करके सत्य की ओर सतत चलते रहना चाहिए।" __ सत्याराधक के साथ सत्य की ओर गमन करने में यदि कोई साथी-सहयोगी नहीं बनता है तो वह उनकी प्रतीक्षा न करके अकेले ही सत्यपथ पर आगे से आगे बढ़ता रहता है। ___ कई आत्म-प्रशंसा के भूखे लोग, जिनमें कुछ साधु भी होते हैं, आत्म-प्रशंसा के अवसर पर असत्य को सौ पर्यों के पीछे छिपाने में नहीं चूकते । वे बाहर से पूरे सत्यवादी बने रहते हैं, पर अन्दर में असत्यवादी होते हैं। एक गाँव में एक आत्म-प्रशंसक गुरु रहते थे । एक दिन एक किसान ने उनकी प्रशंसा व चामत्कारिक शक्ति से प्रभावित होकर उनसे एक प्रश्न का उत्तर देने की प्रार्थना की-"महाराज ! मेरा बोया हुआ अनाज खेत में सूख रहा है, बरसात होगी या नहीं ?" किसान के द्वारा अपनी प्रशंसा सुनकर उसके दिल में श्रद्धा जमाने के लिए Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.004012
Book TitleAnand Pravachan Part 09
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnand Rushi, Shreechand Surana
PublisherRatna Jain Pustakalaya
Publication Year1980
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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