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________________ चतुर्विशंतिजिन एवं अन्य पूजा - साहित्य - खण्ड लेकर सु भाजन मांहि धर वर रजत - कंचन शुद्धिके । पूजौं सु सुमति - जिनेश वर दातार सार सुबुद्धिके । । ८ । । ॐ ह्रीं श्रीसुमतिनाथजिनचरणाये अष्टकर्मदहनाय धूपम् निर्वपामीति स्वाहा । फल परम भारी मरम जाकौ कहत अन्त न पाइये । लोचन सुनासा रसन कर भुगतत महासुख पाइये । । लैकर सु भाजन मांहि धर वर रजत - कंचन शुद्धिके । पूजौं सु सुमति - जिनेश वर दातार सार सुबुद्धिके ।। ९ ।। ॐ ह्रीं श्री सुमतिनाथजिनप्रतिमा मोक्षफलप्राप्ताय फलम् निर्वपामीति स्वाहा । पानी सु चन्दन दुख निकन्दन आदि सर्व सु होयके । करि थार मध्य सु स्वस्तिका इहि भांति अर्घ संजोयके ।। लेकर सुभाजन मांहि धर वर रजत - कंचन शुद्धिके । पूजौं सु सुमति- जिनेश वर दातार सार सु बुद्धिके ।। १० ।। ॐ ह्रीं श्रीसुमतिनाथजिनप्रतिमाग्रे अनर्घ्यपदप्राप्ताय अर्घ्यम् निर्वपामीति स्वाहा । गीतिका हम निरख जिन प्रतिबिम्ब पूजत त्रिविधकर गुण थापना । तिनके न कारज काज निज कल्याण हेत सु आपना । जैसे किसान करै जु खेती नाँहि नरपति कारनै । अपनौ सु निज परिवार पालन कौ सु कारज सारनै । । ११ । । ॐ ह्रीं श्री सुमतिनाथजिनचरणाग्रे पूर्णार्घ्यम् निर्वपामीति स्वाहा । ( जाप्य १०८ बार - श्रीसुमतिजिनाय नमः) जयमाल दोहा सुमतिनाथ सेवत तिन्हें, सुमति देत तत्काल । मति माफिक तिनकी कहौं, भाषा कर जयमाल । । १२ ।। चौपाई जयन्त विमान छोड़ सुखदाता गर्भ विषै उपजे निजमाता । तनकौ नाम मंगला रानी, नृपति मेघप्रभके मनमानी । । १३ ।। २६३ Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003998
Book TitleDevidas Vilas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVidyavati Jain
PublisherGaneshprasad Varni Digambar Jain Sansthan
Publication Year1994
Total Pages394
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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