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________________ विषय-सूची Iri अज्ञान-विषय में लोक और श्रमणों की समानता ३२१-३२३ ३३१ परद्रव्य मेरा नहीं है इसका दृष्टान्तपूर्वक कथन ३२४-३२७ ३३२-३३४ उपर्युक्त कथन का युक्ति द्वारा समर्थन ३२८-३३१ ३३४-३३७ कर्म के द्वारा ही जीव अज्ञानी अथवा ज्ञानी किया जाता है इसका निराकरण ३३२-३४४ ३३७-३४३ अनेकान्त के द्वारा क्षणिकवाद का निषेध ३४५-३४८ ३४३-३४७ जीव कर्म को करता हुआ तन्मय नहीं होता, इसका दृष्टान्तपूर्वक कथन ३४९-३६५ ३४७-३६१ राग-द्वेष-मोह जीव से अभिन्न परिणाम हैं ३६६-३७१ ३६१-३६४ सब द्रव्यस्वभाव से ही उपजते हैं ३७२ ३६४-३६६ शब्द, रस, गन्ध आदिक बाह्य पदार्थ रागद्वेष के कारण नहीं हैं ३७३-३८२ ३६६-३७१ प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान तथा आलोचना का स्वरूप ३८३-३८६ ३७१-३७३ अज्ञानचेतना बन्ध का कारण है ३८७-३८९ ३७३-३८९ शास्त्र आदि से ज्ञान भिन्न है ३९०-४०४ ३९०-३९६ विशुद्ध आत्मा कुछ नहीं ग्रहण करता है ४०५-४०७ ३९६-३९७ पाखण्डिलिङ्ग और गृहिलिङ्ग मोक्ष के कारण नहीं हैं किन्तु रत्नत्रय मोक्ष का कारण हैं ४०८-४१५ ३९७-४०५ स्याद्वादाधिकार कलश स्याद्वादशुद्धि के लिए पुनः विचार २४६ तत्स्वरूप प्रथमभङ्ग अतत्स्वरूप द्वितीयभङ्ग २४८ एकस्वरूप तृतीयभङ्ग २४९ अनेकस्वरूप चतुर्थभङ्ग २५० स्वद्रव्य की अपेक्षा अस्तित्वरूप पाँचवाँ भंग २५१ परद्रव्य की अपेक्षा नास्तित्वरूप छठवाँ भंग २५२ स्वक्षेत्र की अपेक्षा अस्तित्वरूप सातवाँ भंग परक्षेत्र की अपेक्षा नास्तित्वरूप आठवाँ भंग २५४ स्वकाल की अपेक्षा नास्तित्वरूप नवमाँ भंग २५५ परकाल की अपेक्षा नास्तित्वरूप दशवाँ भंग स्वकीयभाव की अपेक्षा अस्तित्वरूप ग्यारहवाँ भंग २५७ परभाव की अपेक्षा नास्तित्वरूप बारहवाँ भंग २५८ नित्यत्वरूप तेरहवाँ भंग अनित्यत्वरूप चौदहवाँ भंग २६० २४७ २५३ २५६ २५९ Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003994
Book TitleSamaysara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGaneshprasad Varni
PublisherGaneshprasad Varni Digambar Jain Sansthan
Publication Year2002
Total Pages542
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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