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________________ 454 कथित है, और मोक्ष के लिए है। परमात्मप्रकाश में कहा है – धर्म जीव को मिथ्यात्व, राग आदि परिणामों से बचाता है, और उसे अपने निज, शुद्ध भाव में स्थिर करता है। यही भावार्थ महापुराण", चारित्रसार और द्रव्यसंग्रह-टीका में भी है जो धर्म को परिभाषित करते हैं। दार्शनिक ओशो ने महावीर वाणी में कहा है -"जरा और मरण के तेज प्रभाव में बहते हुए जीव के लिए धर्म ही एकमात्र द्वीप, प्रतिष्ठा, गति और उत्तम शरण है।"30 योगसार में धर्म को परिभाषित करते हुए साफ-साफ शब्दों में घोषणा की है – “सिर्फ पढ़ लेने से 'धर्म' धर्म नहीं हो जाता, पुस्तक और पिच्छी धारण कर लेने से भी धर्म नहीं होता, किसी मठ में रहने से भी धर्म नहीं होता, केश-लोच करने को भी धर्म नहीं कहा जा सकता। बल्कि 'धर्म' वह है, जिसमें राग-द्वेष को छोड़कर अपनी आत्मा में ही वास किया जाता है। तीर्थंकरों ने निज-आत्मा में रहने को धर्म कहा है, क्योंकि वह (निजात्मवास) पंचम गति कहे जाने वाले 'मोक्ष' तक पहुंचाता है।" तिप्रपतत्प्राणिधारणाद धर्म उच्चते। संयमादिर्दशविध सर्वज्ञाक्तो विमुक्तये।। - योगशास्त्र 2/11 ख) ज्ञानार्णव - 2/157 ग) राजवार्त्तिक - 9/2/3 भावविसुद्धणु अप्पणउ धम्मु भणे विणु लेहु। चउगइ दुक्खइं जो धरइ जीव पंडतउ एहु।। - परमात्मप्रकाश, 2/68 महापुराण, 47/302 चारित्र सार, 3 द्रव्यसंग्रह टीका, 35 जरामरणवेगेणं, वुज्झमाणाण पाणिणं । धम्मो दीवो पइट्ठा य, गई सरणमुत्तमं ।। - ओशो, महावीर वाणी, भाग.1, पृ. 348 धम्मणु पढियज्ञ होइ धम्मु ण पोत्था पिच्छियहं। धम्मुण मढिय-पएसि धम्मु ण मत्था लुचियइं।। राय रोस वे परिहरिवि जो अप्पाण वसेइ। सो धम्मु वि जिण उत्तिमउ जो पंचमगइ णेइ।। - योगसार, 46-48 Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003971
Book TitleJain Darshan ki Sangna ki Avdharna ka Samikshatmak Adhyayan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPramuditashreeji
PublisherPramuditashreeji
Publication Year2011
Total Pages609
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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