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________________ गिर जाये और संघर्ष इस रूप में कि तुम अपने लक्ष्य को उपलब्ध कर सको । जो व्यक्ति अपने पुरुषार्थ का उपयोग नहीं करता, केवल प्रमाद में डूबा हुआ दिन-रात पाप-कर्म में प्रवृत्त है, भीतर की आग में झुलसता रहता है, मैं नहीं जानता कि वह आदमी इस धरती पर किसी काबिल है । न किसी की आंख का नूर हूँ, न किसी के दिल का करार हूँ । जो किसी के काम न आ सके, मैं वो एक मुस्के - गुबार हूँ । मैं तो किसी के आंख की रोशनी बन पाया और न किसी के दिल की चाहत ही बन पाया । मैं तो वह मुट्ठी भर धूल हूँ, जो किसी के काम न आ सके । I 1 जीवन एक मुट्ठी भर धूल या राख का नाम नहीं है । जीवन जीवन है । जीवन अतीत में भी था, जीवन वर्तमान में भी है और भविष्य में भी रहेगा । तुम्हारा . कर्मयोग इस तरह कर्म के मैदान पर आ जाये कि कर्मयोग तुम्हारे लिये निर्माण और निर्वाण का साधन बन जाये । यदि तुम्हारे जीवन में कर्मयोग नहीं है, तो तुम न तो अपने जीवन का निर्वाह कर पाओगे और न ही समाज एवं राष्ट्र के ही अभ्युत्थान में अपनी भूमिका निभा पाओगे । बेहतर होगा तुम उन्नत लक्ष्य की ओर बढ़ो। युद्ध में प्रवृत्त होओ यानी जीवन-युद्ध में सन्नद्ध होओ। 1 अपने कदम बढ़ाओ । राष्ट्र तुम्हारा आह्वान कर रहा है । महाभारत को तुम्हारी जरूरत है । मुक्ति का तुम्हें निमंत्रण है । जिस व्यक्ति के जीवन में ज्ञानयोग और कर्मयोग का समन्वय बना हुआ है, वह मुक्त हो ही जाता है । उसके लिये बंधन शेष नहीं रहते । वह चक्रव्यूह के बाहर होता है । आज इतना ही निवेदन है । 1 38 | जागो मेरे पार्थ Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003890
Book TitleJago Mere Parth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorChandraprabhsagar
PublisherJityasha Foundation
Publication Year2002
Total Pages234
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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