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________________ जागे सो महावीर जो श्रम और आहुतियाँ दी हैं, उसके लिए इतिहास में पुण्य स्मरण किया जाता है। धर्म-संघऔर उसका भावी स्वरूप सदा-सदा के लिए सम्राट् सम्प्रति का आभारी रहेगा। यह परिणाम आया था श्रमण-जीवन की अनुमोदना और मात्र एक रात के संयम-जीवन के अंगीकार से । ___ भगवान की सदैव यही मंगल भावना रही कि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में श्रमण-मार्ग को स्वीकार करे। चाहे व्यक्ति का संपूर्ण जीवन श्रावक-दशा में बीते, पर मृत्यु के पहले उसके जीवन में वे पल अवश्य आने चाहिए जब वह संयम-मार्ग को स्वीकार कर सके। कोई भी व्यक्ति अपने राग और मोहजनित संस्कारों के साथ ही न मरे, वरन् उसकी मृत्यु के समय ऐसी स्थिति हो कि जैसे कोई साँप, अपनी केंचुली को उतार फेंकता है। मरने से पहले दो घड़ी के लिए ही सही, यदि श्रमण-जीवन को अंगीकार कर लिया जाता है और उसकी अनुमोदना कर ली जाती है तो वह दो घड़ी का संयम-जीवन ही फिर किसी सम्प्रति को पैदा करने में सहायक बन सकता है। जो व्यक्ति जब तक अपने जीवन में श्रमणजीवन की रोशनी नहीं ला पाते, भगवान ने उन्हें तब तक के लिए श्रावक-जीवन की आराधना करने के लिए कहा है। भगवान ने मुक्ति के लिए दो मार्ग बताए हैं - एक श्रमणत्व का और दूसरा श्रावकत्व का। एक मार्ग कठोर है तो दूसरा अपेक्षाकृत सरल। इसे दूसरी तरह से कहें तो मुनि-जीवन विशुद्ध रूप से खांडे की धार पर चलता है और श्रावकजीवन दुधारी तलवार पर चलता है। मैंने श्रावक-जीवन को दुधारी तलवार इसलिए कहा कि उसके जीवन में योग और भोग दोनों ही तरह के अवसर होते हैं, जबकि श्रमण का तो जीवन ही विशुद्ध रूप से योग के लिए समर्पित रहता है। एक श्रावक को भोग भोगते हुए भी अपनी योग-साधना का लक्ष्य आँखों में रखना पड़ता है। उसे भोग-मार्ग में से गुजरने पर भी परिणाम होता है योग-मार्ग को सुरक्षित रखना पड़ता है। श्रावक-जीवन, श्रमण-जीवन से भी कठिन है, बशर्ते व्यक्ति श्रावकजीवन को आचरित करने का सच्चा प्रयास करे । __भगवान कहते हैं कि कोई व्यक्ति ब्राह्मण कुल में पैदा होने से ही ब्राह्मण नहीं हो जाता। कोई वैश्य, क्षत्रिय और शूद्र कुल में पैदा होने से ही वैश्य, क्षत्रिय और शूद्र नहीं बन जाता। आदमी के गुण, उसके कार्य और उसकी रचनाधर्मिता ही उसके ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय और शूद्र बनने के आधार होते हैं। जिस तरह कोई Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003888
Book TitleJage So Mahavir
Original Sutra AuthorN/A
AuthorChandraprabhsagar
PublisherJityasha Foundation
Publication Year2012
Total Pages258
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size5 MB
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