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________________ सम्बन्ध जोड़ना चाहिए। अपने भीतर जो प्रभु रहते हैं, उनके प्रति अपना संबंध जोड़ना चाहिए। निश्चित तौर पर परमात्मा तब हमारी प्रार्थना सुनेंगे। प्रभु हमें रास्ता दिखाते हैं कि वे हमारे आध्यात्मिक संरक्षक हैं । वे सर्वशक्तिमान हैं। वे सर्वत्र हैं। वे हमारे दिल में हैं, अंतर आत्मा में हैं। जब यह बात हमें समझ आ जाएगी, तो जीवन का आध्यात्मिक रहस्य मिल जाएगा कि 'तेरो तेरे पास है, अपने मांही टटोल ।' मंदिर-मस्जिद, गुरुद्वारे जाओ, लेकिन पहले अपने भीतर देखो।अपने भीतर जर्रे-जर्रे में उसकी झाँकी दिखेगी। अपने पर विश्वास रखना, अपने प्रभु पर विश्वास रखना है। इसके लिए खुद को ध्यान में उतारना होगा। ध्यान मार्ग है स्वयं से मुलाकात करने का, परमात्मा से लौ लगाने का। ध्यान अध्यात्म की कुंजी है। ध्यान व्यक्ति के भीतर रहने वाली शांति को महसूस करने, समझने का साधन है। कस्तूरी कुण्डली बसै, सब कुछ आपके भीतर ही है। पहली दोस्ती स्वयं से करें, पहला प्रणाम खुद को करें । यह अहम् भाव की नहीं, समर्पण की बात है कि हम अपने प्रति अपनी आस्था को जगाएँ। हमारी स्वयं के प्रति आस्था जगेगी, तो हम प्रभु को अपने भीतर ही खोज पाएँगे। अपनी समस्याओं के समाधान के लिए हमें इधर-उधर जाने की आवश्यकता नहीं है। अपने भीतर ही उतरेंगे, तो समाधान मिल जाएँगे। खुद को समझेंगे, तो हम समझ पाएँगे कि हमारे भीतर कौन-सी कमजोरी है और उसे दूर करने के लिए क्या करें? उन कमजोरियों, बुराइयों पर विजय पाने का प्रयास करें। भगवान महावीर ने हर किसी के लिए जोर देकर कहा कि सच्ची-तीर्थ यात्रा यही है कि आप अपनी आत्मा में रमण करें। खुद को सुधारें, खुद को अपने वश में करें। कोई व्यक्ति अपने आपको ही नहीं सुधार पाएगा, तो दूसरों को सुधारने की बात करना व्यर्थ है। दुनिया में किसी भी सुधार की शुरुआत अपने-आप से ही होती है। एक व्यक्ति गुरु के पास पहुँचा और उनसे कहने लगा, 'गुरुजी, मुझे ऐसा कोई मंत्र दीजिए, जिससे मैं देवताओं को अपने वश में कर सकूँ।' गुरु चौंके, ये कैसा आदमी है जो भगवान को वश में करना चाहता है। गुरु ने उससे पूछा, 'पहले तो यह बताओ कि क्या तुम्हारा परिवार तुम्हारे वश में है?' उसने जवाब दिया, 'नहीं।' संत ने पूछा, 'क्या तुम्हारी संतान तुम्हारे वश में है?' उसने फिर जवाब दिया, 'नहीं।' संत ने दुबारा पूछा, 'क्या तुम्हारी पत्नी तुम्हारे वश में है ?' व्यक्ति ने फिर नकारात्मक जवाब दिया। संत ने फिर पूछा, क्या तुम खुद स्वयं के वश में हो? वह कहने लगा, इनमें से किसी पर मेरा वश नहीं चलता। गुरु ने उसे समझाया, जब तुम्हारा परिवार तुम्हारे वश में नहीं है और तुम खुद भी स्वयं के वश में नहीं हो, तो देवताओं को वश में कैसे कर पाओगे? तुम्हारा मन ही तुम्हारे वश में नहीं है। पहले खुद को तो वश में करो।' इसीलिए मैंने कहा, सुधार की शुरुआत स्वयं से कीजिए। ___ध्यान और अध्यात्म की यात्रा स्वयं के ही ईर्द-गिर्द होती है। बाहर की तलाश का तो पहला क़दम ही गलत है। अध्यात्म पथिक वही हो सकता है जिसने अपने आपसे 202 Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003862
Book TitleMrutyu Se Mulakat
Original Sutra AuthorN/A
AuthorChandraprabhsagar
PublisherPustak Mahal
Publication Year2011
Total Pages226
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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