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________________ २२२ ? को नहीं भुनाया 'क्या कुँए में डाल कर उसकी टोस हडिडयों को पत्थरों पर नहीं पछाड़ा गया ? कितने ही राज्यों के चरों और सिपाहियों ने उसे चोर और मुजरिम समझ कर अपने चाबुकों से उसके चमड़े नहीं उतारे ? ठोस मानुषी पंजों ठोस मनुष्य महावीर को फाड़ खाने में क्या कमी रक्खी। पर तब तो उसकी चीख तुम्हें कभी न सुनाई पड़ी, देवी ! मुझे तो लगता है कि, महावीर ज़ख्म और चीख से आगे जा चुका, तृशा ।' 'नहीं मैं किसी धोखे में नहीं हूँ, देवता । यह उसका अन्तिम जख्म और अन्तिम चीख है । उसके प्राण 'अशुभ न बोलो, देवी । हम दोनों ही किसी माया के कुचक्र में पड़ गये हैं । हम भ्रम में हैं । महावीर नहीं, तुम चीखीं, रानी ! तुम्हारी आवाज़ मैंने साफ सुनी है ।' । 'नहीं' 'नहीं' 'नहीं । तुम नहीं समझोगे । सुनो, फिर सुनो वह चीख़ ! 'देखो वह हवा में गूंज रही है । मेरा गर्भ चीख़ा, मेरी छाती विस्फोटित हुई, मेरा विश्व-सम्राट, अखिलेश्वर बेटा चीख उठा । मनुष्य की हिंसा, पशु, राक्षस, देव सबसे अधिक भयंकर होती है । आज मनुष्य के अन्तिम हिंसक बेटे ने मनुष्य के चरम शरीरी बेटे पर आखिरी प्रहार किया है ." 'तुम तो किसी अवधिज्ञानी और मन:पर्ययज्ञानी की तरह बोल रही हो, देवी ! ' 1 'केवलज्ञानी की तरह क्यों नहीं ? मेरी योनि बोल रही है । मैं नहीं । क्योंकि वह बिद्ध हो चुकी । वह जान ली गई । उसका भेद खुल गया । वह जीत ली गई अन्तिम रूप से । किस केवलज्ञान से कम है, उसकी यह चीख़, उसकी यह परम वेदना ! एक गंभीर सन्नाटा हमारे बीच अभेद्य हो रहा । 'मुझे कुछ नहीं समझ रहा, तृशा । मुझे आश्वस्त करो, रानी- माँ ।' 'तुम्हारा बेटा, अब मौत से आगे जा चुका । जाओ, निश्चित हो कर सोओ, मेरे नाथ ! ' 'लेकिन उसका शरीर ?' 'उसका शरीर सिद्ध और अमर्त्य हो गया ।' 'समझा नहीं मैं? शरीर का स्वभाव नहीं अमरता । 'महावीर के लिए कुछ अशक्य नहीं ! 'मतलब ?' Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003846
Book TitleAnuttar Yogi Tirthankar Mahavir Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVirendrakumar Jain
PublisherVeer Nirvan Granth Prakashan Samiti
Publication Year1979
Total Pages400
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Biography
File Size6 MB
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