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१६ सच्चाशाह खेमा-देवराणी
चम्पानेर के नगर सेठ चांपसी मेहता और सादुलखान उम. राव, दोनों एक दिन साथ ही साथ राज दरबार को जा रहे थे। इन्हें रास्ते में एक भाट मिला। उसने नगर सेठ की बड़ी शोभा की और अन्त में कहा, कि-'पहले शाह, पीछे बादशाह।" भाट के मुंह से यह बात सुनकर सादुलखान को बड़ा बुरा मालूम हुआ। उसने दरबार में पहुँच कर बादशाह महमूद बेगडा से चुगली खाई, कि "हजूर आली ! यह भिखमंगा भाट टुकड़ा तो आपका दिया हुआ खाता है और तारीफ करता है चापसी मेहता की। आज इसने तारीफ करते करते उन्हें भले शाह बादशाह तक कह डाला ,"
बादशाह ने हुक्म दिया, कि-"भाट को बुलवाओ।" भाट के हाजिर होने पर बादशाह ने उससे पूछा-कि "अरे बंबभाट त् इस बनिये की इतनी तारीफ क्यों करता है ?" बंबभाट ने, उत्तर दिया कि-"गरीब परवर ! उसके बाप-दादों ने बहुत बड़े बड़े काम किये हैं। मैंने इनकी जो प्रशंसा की है, वह बिलकुल ठीक ही है।"
बादशाह ने फिर पूछा-"क्या वे शाह, बादशाह के समान हैं ?"
.. बंबभाट ने निवेदन किया, कि-"हां खुदाबन्द ! जिस प्रकार आप दुनिया का पालन कर सकते हैं, उसी प्रकार वे भी. उसे जीवित रख सकते हैं। जब संवत् तेरह सौ पन्द्रह (१३१५) का भयंकर अकाल पड़ा था तब जगडूशाह ने ही दुनियाँ को जिलाया था।
बादशाह ने कहा कि-"ठीक, तुम जा सकते हो।" बंबभाट
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