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________________ श्री सम्मति-तर्कप्रकरणम् प्रमाणविषयवाक्यनिरूपणार्थमिदं प्रस्तूयते - तदपि न सम्यक्, 'सवियप्प-णिब्बियप्पं०' [प्र. का. गा० ३५] इत्यादिना तस्यापि निरूपितत्वात्, वाक्यस्य च वस्तुत्वात् तनिरूपणे तस्यापि निरूपितत्वात् न तनिरूपणार्थमप्येतदपुनरुक्तम् । - एवमेतत्, किन्तु प्रमेयप्राधान्येन तद्ग्राहकस्य प्रमाणस्यापि निरूपणमित्येतत्प्रदर्शनद्वारेण तत्प्रतिपादकवाक्यावतारः प्राग् विहितः, इह त्वविद्यमानप्रमेयस्य प्रमाणस्य प्रमाणत्वाऽसम्भवात् प्रमाणनिरूपणद्वारेण प्रमेयनिरूपणमिति प्रदर्शनद्वारेणैतद्वाक्यावतार इत्यदोषः । यद्वा अनेकान्तपक्षोक्तदोषपरिहारोऽनेकधा व्यवस्थाप्यते इति न कश्चिद् दोषः ‘सामण्णम्मि.' इत्यादिसूत्रसंदर्भविरचने ॥२॥ * समीक्षितार्थवचनस्वरूपनिरूपणम् * सामान्य-विशेषानेकान्तात्मकवस्तुप्रतिपादकं वचनमाप्तस्य, इतरदितरस्येत्येतदेव दर्शयन्नाह - पचुप्पन्नं भावं विगय-भविस्सेहिं जं समण्णेइ । एयं पडुच्चवयणं दव्वंतरणिस्सियं जं च ॥३॥ के प्रतिपादक वाक्य का व्युत्पादन किया जाय, तो यह भी बिनजरूरी है, क्योंकि सवियप्प-णिब्वियप्पं० इस प्रथम कांड की ३५ वी गाथा से वह व्युत्पादन भी (यानी प्रमाणविषयप्रतिपादक वाक्य कैसा होना चाहिये यह भी) किया जा चुका है । तथा वाक्य भी तो एक वस्तु ही है, अत: वस्तु की अनेकान्तात्मकता का निरूपण करने पर वाक्य की अनेकान्तात्मकता का निरूपण अपने आप हो जाता है अत: उस के लिये तृतीयकांड का प्रारम्भ पुनरुक्ति के सिवा और कुछ नहीं है । * प्रस्तुत काण्ड का प्रारम्भ सार्थक है - उत्तर * उत्तर :- उत्तर में व्याख्याकार कहते हैं कि आपका कथन वाजिब है, लेकिन प्ररूपणा के प्रकार में अन्तर है । देखिये, पहले-प्रमेय की मुख्यता रख कर प्रमेयग्राहक होने से प्रमाण का निरूपण होता है यह प्रदर्शित करते हुए प्रमाणनिरूपण के अंगभूत प्रमाणविषय प्रतिपादक वाक्य का, सवियप्प-णिव्वियप्प० इस गाथा से अवतार किया गया था । अब यहाँ ऐसा अभिप्राय है कि जिस प्रमाण का कोई प्रमेयभूत विषय ही नहीं है वह वास्तव में प्रमाण ही नहीं है, अतः प्रमाण का व्युत्पादन करने द्वारा प्रमेय का व्युत्पादन विवक्षित किया जाता है -- इस तथ्य को दर्शाते हुए तृतीय कांड में प्रमेयव्युत्पादक वाक्य का अवतार किया जा रहा है । अतः पुनरुक्ति या अन्य किसी दोष को अवकाश नहीं है । ___ अथवा उक्त शंका के उत्तर में संक्षेप में यह ज्ञातव्य है कि अनेकान्तवाद में प्रसञ्जित दोषों का निरसन अनेक तरीके से हो सकता है, यहाँ तीसरे कांड में भी नये तरीके से वही कार्य सिद्ध किया जा रहा है, अतः सामण्णम्मि विसेसो० इत्यादि सूत्रसंदर्भ की रचना में कोई अपराध नहीं है ॥२॥ * आप्तवचन की विशेषता * तीसरी गाथा में ग्रन्थकार यह दिखाना चाहते हैं कि सामान्य-विशेष उभयमिलित अनेकान्तात्मक वस्तु प्रदर्शित करने वाला वचन यह आप्तवचन है, जब कि उस से विपरीत वस्तु दिखाने वाला वचन, आप्त का नहीं होता। मूलगाथा शब्दार्थ :- जिस वचन से वर्तमान पदार्थ का अतीत-अनागत पर्यायों से समन्वय दिखाया जाता है तथा (परमाणुआदि को) द्रव्यान्तर से सम्बद्ध दिखाया जाता है वह वचन प्रतीत्यवचन (=समीक्षितार्थवचन) है ।।३।। Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003805
Book TitleSanmati Tark Prakaran Part 05
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAbhaydevsuri
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year2010
Total Pages442
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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