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प्रथम खण्ड-का० १-परलोकवादः
यच्च सुप्त-मूछिताद्यवस्थासु विज्ञानाभावेन तत्पूर्वकत्वमुत्तरज्ञानस्य न सम्भवति' इत्यभ्यघायि, तदसत; तदवस्थायां विज्ञानाभावग्राहकप्रमाणाऽसंभावात् । तथाहि-न तावत् सुप्त एव तदवस्थायां विज्ञानाभावं वेत्ति. तदा विज्ञानानन्युपगमात, तदवगमे च तस्यैव ज्ञानस्वाद न तववस्थायां तदभावः । नापि पार्श्वस्थितोऽन्यस्तदभावं वेत्ति, कारण-ध्यापक स्वभावानुपलब्धीनां विरुद्धविर्वाऽत्र विषयेऽव्यापारात्, अन्यस्य तदभावावभासकत्वायोगात् । न चाभाववत्तद्धावस्यापि तस्यामवस्थायामप्रतिपत्तिः, स्वात्मनि स्वसंविदितविज्ञानाऽविनाभूतत्वेन निश्चितस्य प्राणाऽपानशरीरोष्णताकारविशेषादेस्तदवस्थायामुपलभ्यमानलिंगस्य सद्भावेनानुमानप्रतीत्युत्पत्तः । जाग्रदवस्थायामपि परसंततिपतितचेतोवृत्तेरस्मदादिभिर्यथोलिंगदर्शनोद्भूतानुमानमन्तरेणाऽप्रतिपत्तेः ।
...."न किचित् चेतितं मया' इति स्मरणादुत्तरकालभाविनस्तदवस्थायामनुभवानुमाने कि वस्त्वसंवेदनम् , स्वरूपाऽसंवेदनं वा"....इत्यादि यद् दूषणमभिहितं; तदप्यसारम् , जाग्रदवस्थाभावि. स्वसंविदितगच्छत्तृणस्पर्शज्ञानाश्वविकल्पसमयगोदर्शनादिषत्तरकालभावि 'न मया किंचिदुपलक्षितम्'
चाहिये"। कारण का विवेक प्रयत्नसाध्य है इसीलिये, पूर्वपक्षी का यह उपालम्भ भी अस्वीकारपराकृत हो जाता है कि 'रूपादि में रूपादिपूर्वकता यह साजात्य है या धूमत्वोपलक्षितावयवपूर्वकत्व'.... इत्यादि । कारण यह है कि हमने कारण आत्मा और कार्य ज्ञान का सादृश्य प्रदर्शित किया है और प्रस्तुत में उन दोनों का कारणकार्यभाव प्रमाणसिद्ध भी है।
[ सुषुप्ति में विज्ञानाभाव साधक प्रमाण नहीं है ] पूर्वपक्षी का यह कहना भी ठीक नहीं है कि-"सुषुप्ति और मूर्छादि दशा में विज्ञान न होने से सूप्तिआदि के उत्तरकाल में होने वाले विज्ञान में ज्ञानपूर्वकता का सम्भव नहीं है" । ठीक न होने का कारण यह है कि मूर्छादि दशा में विज्ञान के अभाव का साधक किसी भी प्रमाण का सम्भव नहीं है। देखिये, सोये हए पुरुष को निद्रावस्था में ऐसा तो अनुभव मान्य नहीं है कि 'अब मेरे में विज्ञान नहीं है'; यदि ऐसा अनुभव मान्य होगा तब तो उसी विज्ञान की सत्ता मान लेनी होगी, फलत: निद्रावस्था में ज्ञानाभाव नहीं सिद्ध होगा । निकटवर्ती अन्य किसी व्यक्ति को भी सोये हये पुरुष में विज्ञान के अभाव का पता नहीं चल सकता, क्योंकि विज्ञान के कारण की अनुपलब्धि, व्यापक की अनुपलब्धि या स्वभावानुपलब्धि अथवा विज्ञान के विरोधी की विधि यानी उपलब्धि इन में से किसी का भी विज्ञानाभावग्रहणरूप विषय में कोई व्यापार उपलब्ध नहीं है और इन से अतिरिक्त भी विज्ञानाभावसाधक कोई प्रमाण नहीं है ।
[सुषुप्ति में विज्ञानसाधक प्रमाण ] यदि कहें कि-'जैसे उस दशा में विज्ञानाभावसाधक कोई नहीं है वैसे ही विज्ञान के सद्भाव की उपलब्धि भी नहीं है'-तो यह ठीक नहीं, क्योंकि उस दशा में विज्ञानसत्ता को साधक अनुमान प्रतीति की उत्पत्ति सुलभ है और उस अनुमान का प्रयोजक लिंग भी है। वह इस प्रकार-आत्मा में निद्रावस्था में स्वसंविदित विज्ञान के अविनाभाविरूप में सुनिश्चित प्राण अपान वायु का संचार, तथा शरीरगत उष्णतादि ही विज्ञान के लिंगभूत हैं जो उस अवस्था में स्पष्ट उपलब्ध होते हैं । जाग्रत् अवस्था में भी उपरोक्त लिंग के दर्शन से जन्य अनुमानप्रतीति के विना परसंतानगत चित्तवृत्ति ( विज्ञानादि ) का उपलम्भ शक्य नहीं है ।
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