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________________ उ. अ. ३२ २७० असणंचेच अपच अर्चितणचैव अकित्तणंच | इथ्थीजणसा रिय झाणजुग्गंहियं सया बंभचरे रयाणं ॥ १५॥ कामं देव विभूसियाहं न चाइया खोभइउं तिगुत्ता । तहावि एगंत हियंति नच्या विवित्त वासो मुणिणं पसथ्यो ॥ १६ ॥ मोख्खा भिकंखिस्सवि माणवरस संसार भीरुस्स ठियस्स धम्मे । न तारिसं दुत्तरमध्थि लोए जहि थिओ बाल मणो हराओ ॥ १७ ॥ एएय संगे समइक्क भित्ता सुहुत्तराचेत्र भवंति सेसा । जहा महासागर मुत्तरिता नई भवे अत्रि गंगा समाणा ॥ १८ ॥ कामाणु गिडिप्पभवंखु दुख्खं सव्वरस लोगस्स सदेवगरस । जं काइयं माणसियंच किंचि तस्सं तगं गछुइ वीयरागो ॥ १९ ॥ धर्म-ध्यानम अनुरक्त रहेनार आयें अने सदा सर्वदा ब्रह्मचर्यना रागी पुरुषे स्त्री जाति तरफ जोवं नहि, तेनी इच्छा करवी नहि तेनुं चिंत्वन कर नहि तेमज तेनां वखाण करवां नहि. [१५]. जो के त्रण गुप्ते, गुप्ता पुरुषने अलंकारे करी सहित एबी देवांगनाओ पण क्षोभ पाडवाने असमर्थ छ, तथापि साधुने माटे स्त्रीयादिक रहित एकांतवास (तीर्थकरे) हितकारक कह्योछे. [१६] मोक्षना अभिकाषि, संसारथी डरनार अने धर्म प्रमाणे वर्त्तनारने पण, अज्ञानीनां मन हरण करनार स्त्रीना जेवुं आ लोकमां बीजुं hi दुस्तर [दोहलुं] नथी. [१७]. जेवी रीते महासागर पार उतरनारने गंगा जेवी म्होटी नदी उतरवी अति सहेल छे, तेम स्त्री संगथी विरक्त थयेलाने आ लोकमां बीजुं वधुं त्यागं सहेल छे. (१८). कामनी इच्छाथी देवता सहित सर्व लोकने दुःख उपजेछे. श्री वीतराग मुनीवर काया तथा मननां सर्व दुःखनो अंत आणी शके छे. [१९]. * All others will offer no difficulties. Jain Educationa International For Personal and Private Use Only 000000060 www.jainelibrary.org
SR No.003693
Book TitleAgam 43 Mool 04 Uttaradhyayan Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMehta Mohanlal Damodar
PublisherMehta Mohanlal Damodar
Publication Year
Total Pages352
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_uttaradhyayan
File Size20 MB
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