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________________ (१०) कलंक उतारीयु, में पावक कीधो पाणी रे ॥ शि॥ ॥४॥ चंपा बार उघामियां, वली चारणीये काढ्यु नीरोरे ॥ सतीय सुनमा जस थयो, में तस कीधी नीरो रे ॥ शि ॥ ५॥ राजा मारण मांमियो, राणी अनयाये दूषण दाख्यो रे ॥शूली सिंहासन में की यो, में शेठ सुदर्शन राख्यो रे ॥ शि० ॥६॥ शील सन्नाह मंत्रीशरे,श्रावतां अरिदल थंन्यो रे ॥ तिहां पण सांनिध में करी, वली धरम कारज श्रारंज्यो रे ॥ शि ॥ ७॥ पहेरण चीर प्रगट किया, में अ कोत्तरसो वारो रे ॥ पांमवनारी सौपदी, में राखी मा म उदारो रे ॥ शि० ॥ ॥ ब्राह्मी चंदनबालिका, व ली शीलवंती दमयंती रे॥ चेमानी साते सुता, राजि मती सुंदरी कुंती रे ॥ शि ॥ ए॥ इत्यादिक में न इस्या, नर नारीनां वृंदो रे ॥ समयसुंदर प्रनु वीर जी, पहेलो मुऊ आणंदो रे॥ शि० ॥ १० ॥ ॥दोहा॥ ॥ तप बोट्युं त्रटकी करी, दानने तुं अवहील॥ पण मुफ आगल तुं किश्यु, सांजल रे तुं शील ॥ ॥१॥ सरसां जोजन ते तज्यां, न गमे मीग नाद॥ देह तणी शोना तजी, तुऊमां किस्यो सवाद ॥२॥ Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003687
Book TitleStavanavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Bhimsinh Manek
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year
Total Pages162
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
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