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________________ (१४७) मीजें ॥ २२॥ नृप गारुमविद अविलंबें, मूके तव शैल अलंबें ॥ पुकर विषधर आणवा, गया हसता ते ततखेवा ॥ २३ ॥ वस्त्र कुंमल नूपें लेई, तलवरने सोंप्यो तेई ॥ बंध आवी मलया राणी, पण ढालें व हेशे पाणी ॥ २४॥त्रीजे खंमें बीजी ढाल, श्म कांति कहे सुरसाल ॥ केई कौतुक होशे आगे, सांन लजो श्रोता रागें ॥ २५॥ इति ॥ ॥दोहा॥ ॥ एहवे पटराणी तणी, महुलणी आवी दोग। गलगलती नृपागलें, कहे एम कर जोम॥१॥देव खबर नहीं कुमरनी, पंचम दिन ने आज ॥ नेट अ निष्ट इहां किस्युं, दीसे वे नर राज ॥२॥ पुत्र रतन पुर्लन हले, हारतणी शीवात॥शैल अलंबाथी पमी, करशुं ते फुःख घात॥३॥अविनय जे कीधा हुवे, ते खमजो नरनाथ ॥ संदेशा तुम राणीये, इम दीधा मुज हाथ ॥४॥ समयोचित चित्तमां धर, करो या प हित जाणी ॥ईम सुणी नरपति तेहने, पत्नणे श्र वसर वाणी ॥५॥ ॥ ढाल त्रीजी ॥ मुंबखमानी देश ॥ मुज वचनें इम लांखजो रे, राणी समीपें जाय ॥ स Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003682
Book TitleMahabal Malayasundarino Ras
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Bhimsinh Manek
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year1907
Total Pages324
LanguageGujarati
ClassificationBook_Devnagari
File Size12 MB
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