SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 149
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ (१४६) रूप प्रकाशी ॥ कुंमलने उकूलनी फाली, उसख्यां म हबलनां जाली ॥४॥ तलवर कहे किहांथी लाधां, आनूषण कुमरनां बाधां ।।श्म कही नृपपासें खाव्यो, देखी नृप चित्त चमकाव्यो ॥५॥ कहे कोण पुरुष ए नवलो, सोहे जूषणे करी लांतीलो ॥ मुज सुतनां पहिस्यांदीसे, आजूषण विश्वावीसें ॥६॥तलवर क हे ए हिसंतो, पकड्यो पुरमा पेसंतो ॥ पूज्यो पण उत्तर नापे, पूगे वली जो हवे आपे ॥ ७॥ नूपति कहे कुंण तुं किहांथी, आव्यो कहे साच जिहांथी। मलया मनमांहे विमासे, साचुं शहां जूळ नासे ।। कहिशुंअमचरित्र वखाणी, कोइसर्दहशे नहीं प्राणी ॥ कहेवू नहीं पीनमा पाखें, लावी मटशे नहीं लाखें ॥ ए॥श्म धारीने मलया बोले, महबल मु ज मित्रने तोलें ॥ते माटे ए वेश प्रसिझो, मुजने ते णे पेहेरण दीधो॥ १०॥ शूरपाल कहे तेह क्या , सा कहे शहां हिज जिहां त्यां ॥ नृप कहे होये जो हांगवे, मुज मलवातो किम नावे ॥११॥ जूठी सवि वात प्रकाशी, चोकस न पनी विण रासी ॥महबल थी प्रीति वखाणे, तो सेवक को तुज जाणे ॥१५॥ इत्यादिक वचन सुणीने, रही मौन धरी मन हीने॥बो Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003682
Book TitleMahabal Malayasundarino Ras
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Bhimsinh Manek
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year1907
Total Pages324
LanguageGujarati
ClassificationBook_Devnagari
File Size12 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy