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________________ २ - आभ्यन्तर-जगत ११ धोखा दिया | वही हैं मेरे गुरुदेव जिनकी शरणसे इसे देखने तथा समझने वाली अन्तर्दृष्टि प्राप्त होती है । ४. वीचिमाला चित्तके स्वरूप तथा कार्य विधिका थोड़ासा दिग्दर्शन कराता हूँ । जिस प्रकार किसी शान्त सरोवरमें कंकड़ फेंकनेसे उसमें वर्तुलाकार वीचिमाला उत्पन्न हो जाती है, उसी प्रकार किसी भी विषय के प्राप्त होनेपर चित्तमें वर्तुलाकार' विकल्प उत्पन्न हो जाते हैं । जिस प्रकार सरोवरगत वीचिमाला की अनेकों वीचियें मध्यलोकवर्ती असंख्यात द्वीप समुद्रोंकी भाँति एक दूसरेको परिवेष्टित करती हुई विस्तारको प्राप्त होती चली जाती हैं, उसी प्रकार चित्तगत उक्त विकल्प - मालाके अनेकों विकल्प एक दूसरेकी परिक्रमा करते हुए विस्तारको प्राप्त होते जाते हैं । उनका विस्तार उत्तरोत्तर द्विगुण-द्विगुण होता चला जाता है । जिस प्रकार सरोवरगत वीचियोंका केन्द्र-बिन्दु वह स्थल होता है जहाँ कि वह कंकड़ उसमें गिरायी गयी थी, उसी प्रकार चित्तगत सकल विकल्प उस संकल्प - बिन्दुकी परिक्रमा करते होते हैं जोकि विषयको प्राप्त करनेके अनन्तर क्षण में वहाँ जागृत होता है । इस विषयको थोड़ा और स्पष्ट करता हूँ । कल्पना कीजिये कि आप अपने कमरेमें शान्त बैठे हैं । इतने में किसी भिक्षार्थीने आकर आपका द्वार खटखटाया । आपने उठकर चार आने उसे दे दिये । भिखारी चला गया, परन्तु आपके चित्तमें वह अब भी बैठा है । 'इन लोगोंका सुधार होना आवश्यक है ।' इत्यादि अनेकों विकल्प एकके बाद एक उत्पन्न होकर आपको घेर लेते हैं और आप उसके अतिरिक्त अन्य सब कुछ भूल जाते हैं । १. वर्तुलाकारका अर्थ आगे चलनेपर स्पष्ट हो जायेगा । For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org
SR No.003676
Book TitleKarm Rahasya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJinendra Varni
PublisherJinendra Varni Granthmala
Publication Year1993
Total Pages248
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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