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________________ २८-संस्कार १६५ कुछ उनकी जागृति में निमित्त होती हैं । परिस्थितियां सीधे रूपसे हमें करनेके लिये बाध्य नहीं करतीं । यद्यपि लगता ऐसा ही है कि हम परिस्थितियों में बँधे हुए हैं, परन्तु यह बाह्य दृष्टि है जो संस्कारों को न देखकर केवल परिस्थितियों को देखती है । इसलिये यहां यह बात अवधारण कर लीजिये कि आप वास्तवमें परिस्थितियोंके नहीं संस्कारोंके दास हैं । प्रथम अधिकारमें आपने जो प्रश्न किया था कि वे परिस्थितियां कहां स्थित हैं, उसका उत्तर यहां आ गया है कि वे कहीं बाहर में नहीं हैं, संस्कारोंके रूपमें हमारे तथा आपके भीतर Subconcience या उपचेतनाके अक्षयकोशमें स्थित हैं । इसे ही शास्त्रीय भाषामें बन्ध-तत्त्व कहा गया है । इन संस्कारोंको तोड़ना या बदलना ही पारमार्थिक स्वतन्त्रता प्राप्त करनेका उपाय है । मुमुक्षु साधकोंका अथवा योगियोंका एकमात्र यही लक्ष्य है । * शारीरिक मल की शुद्धि मिट्टी तथा जल से होती है परन्तु मोह तथा अहंकार रूपी मल की शुद्धि ज्ञान तथा वैराग्य रूपी जल से होती है । * शास्त्रज्ञानके बिना साधना संभव नहीं है परन्तु शास्त्रज्ञान का अहंकार साधना के लिये दावाग्नि के समान है । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003676
Book TitleKarm Rahasya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJinendra Varni
PublisherJinendra Varni Granthmala
Publication Year1993
Total Pages248
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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