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________________ का पुत्तु भिच्चु वि किं भण्णइ तं णिसुणेवि मंति तहो सुच्चइ वारह वरिस जाम गुणकित्तणु तो एत्यंतरे राएँ वृत्तउ चिरसेवयणरु जं ण वि अक्खिउ जो णमुणेइ मंतित्तणु घत्ता स एवं चवंतो ओ तुट्ठ सया पंच रण्णा णिओ तेण उत्तो ण सो अत्थि जो मे सत्तंगु रज्जु तहो पंचविहु मंतु मंति जो जाणइ । चउ विज्जउ भिच्च गुणागुण वि पहुपसाय सो माणइ ||७|| (8) पुत्तं णिवेणं जया होंति गामा जणा आणयारा हा वायुवेया रहा चारुचक्का सुरूवा सुमेहा सुपुत्ता सुमित्ता अलं तेण वालं धणे सोक्खभाई विजाई सुजाई निवत्थाण वाई अवीरो वि वीरो असच्चो वि सच्चो धावि पुणो ३२ जो महु कज्जि तिणु व तणु मण्णइ । 5 हरिमेहरणंदणु हलि वुच्चइ । तुम्ह देव करइ भिच्चत्तणु । हा अमच्च पई कयउ अजुत्तउ ! तं पणीइत्थु ण उ लक्खिउ । सो कहति पहुहि पहुतणु । Jain Education International परिदो नियंतो । हलियस तेणं । सगमाण दिण्णा । सुही धुत्त । पोएम गा । अलं रे अणेण । तथा अत्थकामा । गया सेण्णसारा | भडा चंडतेया । धया छत्तढक्का । पिया पीणणेहा | सुबंधू विभत्ता । धणं सच्चमूलं । भाई वहाणं जाई । णिरुवी सुरूती । अधीरो वि धीरो । गुणी होड़ मच्चो । या सोसण 10 For Private & Personal Use Only 10 ( 7 ) 1.a अगुरु for अवs, b कहाणउं, 2.a fण्णउ, 3. b एक्कहिं, b जाम ता पेच्छइ, 4.b तुरंग, 5.a कहो for कि, b भण्णई, a तणु व तिणु, b मण्णई, 7 a वरिसा जाव, a तुम्हह, 8.2 राय, a पइ, 9.b ०सेवयरु, 10. कहिं, 11.a सत्तंगु रज्ज, b तहं, b मंति मंत्तु जो जाणई, 12.b भिच्च, b माणेइं । 15 www.jainelibrary.org
SR No.003672
Book TitleDhammaparikkha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBhagchandra Jain Bhaskar
PublisherSanmati Research Institute of Indology Nagpur
Publication Year1990
Total Pages312
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size11 MB
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