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________________ सम्यक्त्व-पराक्रम ४६९ (३) मुक्ति (सू० ६२) श्रोत्रेन्द्रिय निग्रह के परिणाम : (१) प्रिय और अप्रिय शब्दों में राग और द्वेष का निग्रह ! (२) शब्द हेतुक नए कर्म का अग्रहण और पूर्व संचित कर्म का क्षय । (सू० ६३) चक्षुरिन्द्रिय - निग्रह के परिणाम : (१) प्रिय और अप्रिय रूपों में राग और द्वेष का निग्रह | (२) रूप- हेतुक नए कर्म का अग्रहण और पूर्व संचित कर्म का क्षय । (सू० ६४ ) घ्राणेन्द्रिय निग्रह के परिणाम : (१) प्रिय और अप्रिय गंधों में राग और द्वेष का निग्रह | (२) गंध हेतुक नए कर्म का अग्रहण और पूर्व संचित कर्म का क्षय । (सू० ६५) रसनेन्द्रिय - निग्रह के परिणाम : (१) प्रिय और अप्रिय रसों में राग और द्वेष का निग्रह | (२) रस हेतुक नए कर्म का अग्रहण और पूर्व संचित कर्म का क्षय । ( सू० ६६) स्पर्शनेन्द्रिय - निग्रह के परिणाम : (१) प्रिय और अप्रिय स्पर्शो में राग और द्वेष का Jain Education International अध्ययन २६ : आमुख निग्रह | (२) स्पर्श - हेतुक नए कर्म का अग्रहण और पूर्व संचित कर्म का क्षय । (सू० ६७) क्रोध - विजय के परिणाम : (१) क्षमा । (२) क्रोध - वेदनीय कर्म का अग्रहण और पूर्व संचित क्रोध - वेदनीय कर्म का विलय । (सू०६८) मान- विजय के परिणाम : (१) मार्दव। (२) मान - वेदनीय कर्म का अग्रहण और पूर्व संचित मान- वेदनीय कर्म का विलय । (सू० ६६) माया- विजय के परिणाम : (१) आर्जव । (२) माया - वेदनीय कर्म का अग्रहण और पूर्व संचित माया-वेदनीय कर्म का विलय । (सू०७०) लोभ- विजय के परिणाम : (१) सन्तोष (२) लोभ - वेदनीय कर्म का अग्रहण और पूर्व संचित लोभ-वेदनीय कर्म का विलय । (सू० ७१) प्रेम, द्वेष और मिथ्या दर्शन विजय के परिणाम : (१) ज्ञान, दर्शन और चारित्र - आराधना की तत्परता । (२) मुक्ति (सू० ७२) For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003626
Book TitleAgam 30 Mool 03 Uttaradhyayana Sutra Uttarajjhayanani Terapanth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTulsi Acharya, Mahapragna Acharya
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year2006
Total Pages770
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_uttaradhyayan
File Size25 MB
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