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________________ अष्टम अध्ययन : सूत्र १७७-१८० २१० नायाधम्मकहाओ १७७. तए णं ते जियसत्तुपामोक्खा छप्पि रायाणो तेणं असुभेणं १७७. जितशत्रु प्रमुख उन छहों राजाओं ने उस अशुभ गन्ध से अभिभूत गंधेणं अभिभूया समाणा सएहिं-सएहिं उत्तरिज्जेहिं आसाइं होकर अपने-अपने उत्तरीय-वस्त्रों से मुंह को ढंक लिया। मुंह ढंक पिहेंति, पिहेत्ता परम्मुहा चिट्ठति ।। कर पीठ फेर ली। १७८. तए णं सा मल्ली विदेहरायवरकन्ना ते जियसत्तुपामोक्खे एवं १७८, विदेह की प्रवर राजकन्या मल्ली ने जितशत्रु प्रमुख उन छहों वयासी--किण्णं तुब्भे देवाणुप्पिया! सएहि-सएहिं उत्तरिज्जेहिं राजाओं से इस प्रकार कहा--देवानुप्रियो! तुम अपने-अपने उत्तरीय-वस्त्रों आसाइं पिहेत्ता परम्मुहा चिट्ठह? से मुंह ढंक कर और पीठ फेर कर क्यों बैठे हो? १७९. तए णं ते जियसत्तुपामोक्खा मल्लिं विदेहरायवरकन्नं एवं वयंति--एवं खलु देवाणुप्पिए! अम्हे इमेणं असुभेणं गंधेणं अभिभूया समाणा सएहि-सएहिं उत्तरिज्जेहिं आसाइं पिहेत्ता परम्मुहा चिट्ठामो॥ १७९. वे जितशत्रु प्रमुख राजा विदेह की प्रवर राजकन्या मल्ली से इस प्रकार बोले--देवानुप्रिये! हम इस अशुभ गन्ध से अभिभूत होकर अपने-अपने उत्तरीय वस्त्रों से मुंह ढंक कर बैठे हैं। १८०. तए णं मल्ली विहेहरायवरकन्ना ते जियसत्तुपामोक्खे एवं वयासी--जइ ताव देवाणुप्पिया! इमीसे कणगमईए मत्थयछिड्डाए पउमुप्पल-पिहाणाए पडिमाए कल्लाकल्लि ताओ मणुण्णाओ असण-पाण-खाइम-साइमाओ एगमेगे पिंडे पक्खिप्पमाणेपक्खिप्पमाणे इमेयारूवे असुभे पोग्गल-परिणामे, इमस्स पुण ओरालियसरीरस्स खेलासवस्स वंतासवस्स पित्तासवस्स सुक्कासवस्स सोणियपूयासवस्स दुरुय-ऊसास-नीसासस्स दुरुयमुत्त-पूइय-पुरीस-पुण्णस्स सडण-पडण-छेयण-विद्धसणधम्मस्स केरिसए य परिणामे भविस्सइ? तंमा णं तुब्भे देवाणुप्पिया! माणुस्सएसु कामभोगेसु सज्जह रज्जह गिज्झह मुज्झह अझोववज्जह । एवं खलु देवाणुप्पिया! अम्हे इमाओ तच्चे भवग्गहणे अवरविदेहवासे सलिलावतिसि विजए वीयसोगाए रायहाणीए महब्बलपामोक्खा सत्तवि य बालवयंसया रायाणो होत्था--सहजाया जाव पव्वइया । तए णं अहं देवाणुप्पिया! इमेणं कारणेणं इत्थीनामगोयं कम्मं निव्वत्तेमि--जइ णं तब्भे चउत्थं उवसंपज्जित्ता णं विहरह, तए णं अहं छठें उवसंपज्जित्ता णं विहरामि सेसं तहेव सव्वं । तए णं तुब्भे देवाणुप्पिया! कालमासे कालं किच्चा जयंते विमाणे उववण्णा । तत्थ णं तुम्भं देसूणाई बत्तीसं सागरोवमाइं ठिई। तए णं तुब्भे ताओ देवलोगाओ अणंतरं चयं चइत्ता इहेव जंबुद्दीवे दीवे जाव साइं-साई रज्जाई उवसंपज्जित्ता णं विहरह । तएणं अहं ताओ देवलोगाओ आउक्खएणं जाव दारियत्ताए पच्चायाया। १८०. विदेह की प्रवर राजकन्या मल्ली जितशत्रु प्रमुख उन (छहों राजाओं) से इस प्रकार बोली--देवानुप्रियो! यदि मस्तक में छेद और पद्म-कमल के ढ़क्कन वाली इस स्वर्णमयी प्रतिमा में, प्रतिदिन प्रभातकाल में उस मनोज्ञ अशन, पान, खाद्य और स्वाद्य में से प्रक्षिप्त एक-एक पिण्ड का यह इस प्रकार का अशुभ पुद्गल परिणमन है तो ____ इस औदारिक शरीर का--जिससे कफ, वमन, पित्त, शुक्र, शोणित और पीव झरते हैं, उच्छवास-नि:श्वास से दुर्गन्ध आती है जो दुर्गन्धित मल-मूत्र और पीव से प्रतिपूर्ण है, जो सड़ने, गिरने, कटने और विध्वस्त होने वाला है, का--कैसा परिणमन होगा? इसलिए देवानुप्रियो! तुम मनुष्य संबंधी काम भोगों में आसक्त, अनुरक्त, गृद्ध, मुग्ध और अध्युपपन्न८ मत बनो। देवानुप्रियो! इससे पूर्व तीसरे भव में हम सातों ही अपर विदेह वर्ष, सलिलावती विजय और वीतशोका राजधानी में महाबल प्रमुख सात बालवयस्य राजा थे--सहजात यावत् सहदीक्षित थे। देवानुप्रियो! उस समय मैंने इस कारण से स्त्री नाम-गोत्र-कर्म का निवर्तन किया यदि तुम चतुर्थ-भक्त स्वीकार कर विहार करते तो मैं षष्ठ-भक्त स्वीकार कर विहार करती। इसी प्रकार शेष सम्पूर्ण वर्णन । तत्पश्चात् देवानुप्रियो! तुम मृत्यु के समय मृत्यु को प्राप्त कर जयंत-विमान में उत्पन्न हुए। वहां तुम्हारी स्थिति कुछ कम बत्तीस सागरोपम थी। तुम उस देवलोक से च्युत होकर सीधे इसी जम्बूद्वीप द्वीप में उत्पन्न हुए यावत् अपने-अपने राज्यों का संचालन करने लगे। मैं उस देवलोक से आयुक्षय होने पर यावत् बालिका के रूप में यहां आई हूं। गाथा गाहा किंथ तयं पम्हुटुं, जंथ तया भो! जयंतपवरम्मि। वुत्था समय-णिबद्धा, देवा तं संभरह जाई।।१।। हे राजाओ! क्या तुम उसे भूल गए। उस समय हम संकेत में बंधे हुए२५ (एक-दूसरे को प्रतिबोध देंगे) देव प्रवर जयन्त-विमान में निवास करते थे। उस जन्म को याद करो। Jain Education Intemational For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003624
Book TitleAgam 06 Ang 06 Gnatadharma Sutra Nayadhammakahao Terapanth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTulsi Acharya, Mahapragna Acharya
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year2003
Total Pages480
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_gyatadharmkatha
File Size17 MB
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