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________________ ढाल : ५०० भगवती सूत्र का स्वरूप दूहा १. सव्वाए भगवईए अद्वतीसं सतं सयाणं (१३८) १. सुण्या मावती में भला, सर्व शतक सुविचार । इकसी में अडतीस जे, अर्थ उदग्ग उदार' ।। २. प्रथम बतीसज शतक में, अंतर शतक न कोय । ते माटे इक-एक हिज, शतक तिके अवलोय ।। ३. तेतीसम थी सात शत, तेह विषे अवलोय । बार-बारै अंतर शतक, ए चोरासी होय ।। ४. फुन चालीसम शतक में, अंतर शत इकवीस । इकतालीसम एकहिज, सह इकसौ अड़तीस ।। ५. इकसौ अड़ती शतक नां, सर्व उद्देशा देख । उगणीसौ पणवीस जे, कहिवा सिद्धत देख ।। ६. हिवै भगवती सूत्र नों, कहियै छै परिमाण । श्रोता चित दै सांभलो, वर वचनामृत जाण ।। * सुगुण जन सुणिय जी, कै स्थिर चित शुणिय जी। हो जी म्हारा जयवंता जिनराज तणां वच वारू जी। चमत्कृत चारू जी ।। (ध्रुपदं) ७. लक्ष चोरासी पद भला कांइ, पद नों मान पिछाण । विशिष्ट संप्रदाई करो काइ, परंपरा करि जाण ।। ८. प्रवर प्रधानज ज्ञान छै कांई, तिणे करीने जेह। देखे छै जे केवली, पद तिणे परूप्या एह ।। २. आद्यानि द्वात्रिंशच्छतान्यविद्यमानावान्तरशतानि ३२। (वृ. प. ९७९) ३. त्रयस्त्रिशादिषु तु सप्तसु प्रत्येकमवान्तरशतानि द्वादश ८४ । (वृ. प. ९७९) ४. चत्वारिशे त्वेकविंशतिः २१, एकचत्वारिंशे तु नास्त्य वान्तरशतम् १, एतेषां च सर्वेषां मीलनेऽष्टत्रिंशदधिकं शतानां शतं भवति । (वृ. प. ९७९) ५. उद्देसगाण एगुणविंशतिसताणी पंचविसइअहियाणी (१९२५)। ६. अथ भगवत्या व्याख्याप्रज्ञप्त्या: परिमाणा भिधित्सया गाथामाह (वृ. प. ९७९) ९. सूत्र स्वरूपज दाखियो, हिव कहिय अर्थ स्वरूप । भाव अभाव अनंत ही कांइ, आख्या अधिक अनूप ।। ७,८. चुलसीइ सयसहस्सा, पदाण पवरबरनाणदंसीहि । 'चुलसी' त्यादि, चतुरशीतिः शतसहस्राणि पदानामत्राङ्ग इति सम्बन्धः, पदानि च विशिष्टसम्प्रदायगम्यानि, प्रवराणां वरं यज्ज्ञानं तेन पश्यन्तीत्येवंशीला ये हे प्रवरज्ञानदर्शिनस्त: देवलि भिरित्यर्थः प्रज्ञप्तानीति योगः, (वृ. प. ९७९) ९. इदमस्य सूत्रस्य स्वरूपमुक्तमथार्थस्वरूपमाह (वृ. प. ९७९) भावाभावमणता, पण्णत्ता एत्थमंगम्मि ।।१।। १०. 'भावाभावमणंत' त्ति 'भावा-जीवादय: पदार्थाः अभावाश्च'-त एवान्यापेक्षया भावाभावाः, (वृ. प. ९७९) ११. अथवा भावा-विधयोऽभावा--निषेधाः (वृ. प. ९७९) १२. अथवा भावाभाविषयभूतैरनन्तानि भावाभावानन्तानि (वृ. प. ९७९) १०. जीवादिक नव जाणवा कांइ, जेह पदार्थ भाव । तेहिज अन्य अपेक्षया कांइ, अभाव तास कहाय ।। ११. अथवा करिवो कार्य नों कांइ, कहियै तेहनों भाव । कार्य जेह निषेधवो कांइ, अभाव तेह कहाव ।। १२. अथवा भावाभाव जे काइ, विषयभूत पहिछाण । तिणे करीने जाणवा कांइ, जे अनंत परिमाण ।। १. भगवती जोड़ की ढाल ५०० एवं ५०१ के सामने जो पाठ उद्धृत किया है, वह भगवती का मूल अंश नहीं है। परिशिष्ट के रूप में है इसलिए इसमें सूत्र संख्या का क्रम नहीं है। यह पाठ अंगसुत्ताणि भाग २ पृष्ठ १०४५,१०४८ पर उपलब्ध है। *लय : पायल वाली पवमणी ४५४ भगवती जोड़ Jain Education Intemational For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003623
Book TitleBhagavati Jod 07
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTulsi Acharya, Mahapragna Acharya
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year
Total Pages498
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_bhagwati
File Size24 MB
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