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________________ गीतक छंद १. कह्य वृत्तिकारे शिल्पकारक, पुरुष को कूशि कर लियै । रोहणगिरी नां देश भेदी, सन्मणीज प्रकासियै ॥ २. तिम बुद्ध जन उपदेश करि म्हैं, प्रवर पंचम शत तणां । रव प्रतै भेदी अर्थ बहु जे, कृत-प्रकाश सुहामणां ।। ३. तिमहीज भिक्षु दीर्घमालज,' नृपति-इंदु प्रसाद थी। पंचम शतक नीं जोड़ रचना, रची अति आह्लाद थी ।। ४. जिन-वयण-रयण अमूल्य है, व्यभिचारि-रहितपणे जिके । जिन-आण सिर ऊपर ठवी, समदृष्टि अंगीकृत तिके ।। १,२. श्री रोहणानेरिव पञ्चमस्य, शतस्य देवानिव साधुशब्दान् । विभिद्य कुश्येव बुधोपदिष्ट्या, प्रकाशिताः सन्मणिवन्मयाऽर्थाः ॥ (वृ० प० २४९) ढाल ६६ सोरठा १. पंचम शतक प्रकाश, आख्यो अति आनंद स्य् । वर छट्टो सुविलास, हिव अवसर आयो तसु॥ २. उद्देशक दश आद, महावेदन महानिर्जरा । ___ आहार तणो विधि वाद, पन्नवण' भणी भलावियो ।। ३. महाआश्रव छै तास, बहु पुद्गल नुं उपचय । सप्रदेशि सुविमास, अप्रदेशि स्यू जीव छै ।। १. व्याख्यातं विचित्रार्थ पञ्चमं शतं, अथावसरायातं तथाविधमेव षष्ठमारभ्यते, (वृ०प० २५०) २-५. वेदण आहार महस्सवे य सपदेस तमुए भविए । साली पुढवी कम्म अण्णउत्थि दस छ8गम्मि सए । (श० ६।संगहणी-गाहा) ३. 'महस्सवे य' त्ति महाश्रवस्य पुद्गला बध्यन्ते... 'सपएस' त्ति सप्रदेशो जीवोऽप्रदेशो वा (वृ०प० २५०) ४. भव्यो-नारकत्वादिनोत्पादस्य योग्य "सालि' त्ति शाल्यादि-धान्यवक्तव्यताऽश्रितः (वृ० प० २५०) ५. 'पुढवि' त्ति रत्नप्रभादिपृथिवी वक्तव्यता...'कम्म' त्ति कर्मबन्धाभिधायक: (वृ०प० २५०) ४. तमस्काय अधिकार, नरक उपजवा योग्य ते । सालि आदि सुविचार, धान्य योनि स्थिति सातमे ॥ ५. पृथ्वी रत्नप्रभादि, कर्मबंध नवमें कह्य। अन्यतीथिक संवादि, षष्ठ शते उद्देश दश ॥ *देव जिनेन्द्र दयाल तणां शिष गोयम गणधर गिरवारे। परम प्रीत वर प्रश्न पूछंता, निज-पर-भवदधि तिरवा रे। उत्तर स्वाम अमल चित अतिहित, बिहु शिव-सुन्दर वरवा रे। (ध्र पदं) ६. हे प्रभु ! जे महावेदन पोड़ा, ते महानिर्जरवंतो रे । जे महानिर्जर ते महावेदन ? प्रश्न प्रथम ए तंतो रे ।। ७. तथा महावेदन अल्पवेदन मांहि, तेहिज श्रेय पिछाणी। जेह प्रशस्त निर्जरा प्रभुजी? जिन कहै हंता जाणी॥ १. द्वितीय आचार्य श्री भारीमालजी २. पग्णवणा पद २८ *लय : लाल हजारी को जामो विराज ६. से नूणं भंते ! जे महावेदणे से महानिज्जरे ? जे महा निज्जरे से महावेदणे? ७. महावेदणस्स य अप्पवेदणस्स य से सेए जे पसत्थ निज्जराए? हंता गोयमा ! जे महावेदणे एवं चेव । (सं० पा०) (श० ६१) श०५, उ० ६,१०, ढाल ९५,९६ १११ Jain Education Interational For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003618
Book TitleBhagavati Jod 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTulsi Acharya, Mahapragna Acharya
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year1986
Total Pages582
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_bhagwati
File Size17 MB
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