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________________ ८७२ सूत्रकृतांग सूत्र हो सकती, क्योंकि ऐसा न मानने पर सर्ववस्तुएँ सर्ववस्तुरूप हो जाएँगी । इस प्रकार जगत् के सब व्यवहारों का उच्छेद हो जाएगा । अतः वस्तु कथञ्चित् है, ऐसा ही मानना चाहिए। तथा ज्ञानरहित क्रिया से कोई कार्य सिद्ध नहीं होता, क्योंकि उस कार्य के उपाय का ज्ञान न हो तो उस उपाय से प्राप्त होने वाले पदार्थ की प्राप्ति नहीं होती है । सभी क्रियाएँ ज्ञान के साथ ही अभीष्ट फल प्रदान करती हैं । दशवेकालिक सूत्र में कहा है - पढमं नाणं तओ दया, एवं चिट्ठइ सव्वसंजए । अन्नाणी किं काही, किं वा नाही य सेय पावगं ॥ अर्थात् - पहले ज्ञान होता है, तब दया की जाती है । सारे संयमी पुरुष पहले जीवों का ज्ञान प्राप्त करते हैं, फिर दया का आचरण करते हैं । जिसको जीवादि पदार्थों का ज्ञान नहीं है, वह पुरुष कैसे दया कर सकता है ? वह कल्याण (पुण्य) और पाप को भी कैसे जान सकता है ?” अतः क्रिया के समान ज्ञान की प्रधानता है । साथ ही यह भी समझ लेना चाहिए कि एकमात्र ज्ञान से भी कार्यसिद्धि नहीं होती, क्योंकि क्रियारहित ज्ञान पंगु के समान है, इसी तरह ज्ञानरहित क्रिया अंधे के समान है । दोनों अलग-अलग रह कर कार्य करने में समर्थ नहीं हैं । इसीलिए शास्त्रकार कहते हैं - 'आहंसु विज्जाचरणं पमोक्ां ।” अर्थात् — तीर्थंकर गणधर आदि ने ज्ञान और चारित्र (क्रिया) दोनों से मोक्ष बताया है । इस ११वीं गाथा की व्याख्या दूसरी तरह से भी की जा सकती है । वह इस प्रकार - वे तीर्थंकर जिन्होंने इन समवसरणों का निरूपण किया है, वे अनिरुद्धप्रज्ञ ( अप्रतिहत केवलज्ञान के धनी) पूर्वोक्त रूप से या आगे कहे जाने वाले ढंग से वस्तुस्वरूप का कथन करते हैं । वे केवलज्ञान के द्वारा चौदह रज्जुस्वरूप या स्थावरजंगमरूप इस लोक को हस्तामलकवत् जानकर तीर्थंकर पद को या केवलज्ञान को प्राप्त हैं । तथा वे श्रमण (निर्ग्रन्थ साधु ) तथा माहन यानी श्रावक संयतासंयत जिस-जिस प्रकार से मोक्षमार्ग व्यवस्थित है - सत्य है, उस उस प्रकार से उपदेश देते हैं । वे कहते हैं कि संसार के प्राणियों को जो कुछ सुख-दुःख प्राप्त होता है, वह सब अपने किये हुए कर्म का फल है, काल, ईश्वर आदि के द्वारा दिया हुआ नहीं है । इसीलिए किसी ने कहा है सव्वो पुव्वकयाणं कम्माणं पावए फलविवागं । अवराहेसु गुणेसु य निमित्तमित्तं परो होई || अर्थात् - सभी प्राणी अपने पूर्वकृत कर्मों का फल प्राप्त करते हैं, दूसरा तो बुराई और भलाई का केवल निमित्तमात्र होता है । निष्कर्ष यह है कि ज्ञान और क्रिया दोनों से ही मोक्ष प्राप्त होता है | अकेले क्रियानिरपेक्ष ज्ञान से, अथवा अकेली ज्ञाननिरपेक्ष क्रिया से मोक्ष नहीं हो सकता । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003599
Book TitleAgam 02 Ang 02 Sutrakrutang Sutra Part 01 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorSudharmaswami
AuthorHemchandraji Maharaj, Amarmuni, Nemichandramuni
PublisherAtmagyan Pith
Publication Year1979
Total Pages1042
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_sutrakritang
File Size17 MB
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