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________________ सूत्रकृतांग सूत्र अर्थात् - यह लोक (संसार) कपट से सिद्ध ( वश ) होता है । बिना कपट के संसार में कुछ प्रवृत्ति नहीं हो सकती । इसलिए लोकव्यवहार के लिए पिता से भी कपट करना चाहिए । ३५८ इस प्रकार स्वच्छन्दाचार और कपटाचार उसके कर्त्ता को नरक - तिर्यंच आदि दुर्गतियों में ले डूबते हैं । कपट और स्वच्छन्दता के फलस्वरूप वे बार-बार कुगतियों में चक्कर लगाते रहते हैं । मायाचार और स्वच्छन्दाचार के दुष्परिणामों को बताकर शास्त्रकार कहते हैं- 'वियडेण पलिति वयसाऽहियासए ।' आशय यह है कि महान् मुनि इन दुष्परिणामों को जानकर माया एवं स्वच्छन्द से रहित शास्त्रोक्त शुद्ध आचार-विचार के द्वारा मोक्ष या संयम में लीन होते हैं । ऐसे शुभभावों से युक्त मुनि ही समस्त ठण्डे, गर्म या अनुकूल-प्रतिकूल परीषहों को मन-वचन काया से समभावपूर्वक सहते हैं । मूल पाठ कुजए अपराजिए जहा अक्खेहि कुसलेहि दीवयं । कडमेव गहाय णो कॉल, नो तीयं नो चेव दावरं ||२३|| } संस्कृत छाया कुजयोऽपराजितो यथाऽक्षैः कुशलो हि दीव्यन् । कृतमेव गृहोत्वा नो कलिं नो त्रैतं नो चैव द्वापरम् ||२३|| अन्वयार्थ ( अपराजिए ) कभी पराजित न होने वाला ( कुसले हि ) कुशल (कुजए ) जुआरी ( जहा ) जैसे ( अवखेहि दीवयं ) पासों से जुआ खेलता हुआ ( कडमेव गहाय ) कृत नामक चतुर्थ स्थान को ही ग्रहण करता है, (णो कलि) कलि को ग्रहण नहीं करता, (नो तीयं नो चेव दाव रं) और न तृतीय स्थान को ग्रहण करता है, न द्वितीय स्थान को । भावार्थ किसी से पराजित न होने वाला, जुआ खेलने में निपुण जुआरी जैसे जुआ खेलता हुआ सर्वश्रेष्ठ कृत नामक स्थान को ही ग्रहण करता है, कलि, द्वापर और त्रेता नामक स्थानों को ग्रहण नहीं करता । व्याख्या कुशल द्यूतकार द्वारा कृत नामक स्थान - ग्रहण इस गाथा में चतुर जुआरी से मोक्षमार्गकुशलसाधक की उपमा देकर Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003599
Book TitleAgam 02 Ang 02 Sutrakrutang Sutra Part 01 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorSudharmaswami
AuthorHemchandraji Maharaj, Amarmuni, Nemichandramuni
PublisherAtmagyan Pith
Publication Year1979
Total Pages1042
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_sutrakritang
File Size17 MB
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