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________________ २१४ व्याख्या जगत् की रचना : विष्णु और माया से सभुणा कडे लोए- इस गाथा में विष्णुकर्तृत्ववाद एवं सायाकर्तृत्ववाद का स्वरूप बताया है । कई मतवादियों खासकर वैष्णवों का कहना है कि यह जगत् विष्णु द्वारा रचित है। उन्हीं की लीला है । स्वयम्भू शब्द ब्रह्मा के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है, और विष्णु के अर्थ में भी । ब्रह्मा ने यह जगत् बनाया है, इस सम्बन्ध में हम पाँचवीं गाथा में विवेचन कर चुके हैं । यहाँ प्रसंगवश विष्णु अर्थ में स्वयम्भू शब्द है । उनका मत इस प्रकार है जो अपने आप होता है, उसे स्वयम्भू कहते हैं, ऐसा स्वयम्भू विष्णु है ।" वह पहले एकाकी ही थे, अकेले ही रमण करते थे । उन्होंने दूसरे की इच्छा की । उनकी इस चिन्ता के पश्चात् ही दूसरी शक्ति उत्त्पन्न हुई और उस शक्ति के होने के बाद ही इस जगत् की सृष्टि हुई । कई दार्शनिक इस जगत् को विष्णुमय मानते हैं । संसार में विष्णु सर्वत्र व्यापक हैं । इस सम्बन्ध में वे प्रमाण प्रस्तुत करते हैं "जले विष्णुः स्थले ज्वालामाला कुले विष्णु, पृथिव्यामप्यहं पार्थ ! सर्वभूतगतश्चाहं, सूत्रकृताग सूत्र विष्णुर्विष्णुः पर्वतमस्तके : सर्व विष्णुमयं जगत् ॥ १ ॥ वायवग्नौ जलेऽस्म्यहम् । तस्मात्सर्वगतोऽस्म्यहम् ॥२॥ अर्थात् - 'जल में विष्णु है, स्थल में विष्णु है, पर्वत के मस्तक पर विष्णु है, अग्नि की ज्वालाओं से व्याप्त स्थल में विष्णु है । सारा जगत् विष्णुमय है । 'हे अर्जुन ! मैं पृथ्वी में भी हूँ, वायु, अग्नि और जल में भी मैं हूँ, और समस्त प्राणियों में मैं हूँ । इसलिए मैं सारे संसार में व्याप्त हूँ ।' विष्णु जगत् की रचना कैसे और कब से करते हैं ? इस सम्बन्ध में मार्कण्ड ऋषि की एक कथा मिलती है Jain Education International सो किल जलय समत्येणुदएणेगन्नवम्मि वीती परंपरेण घोलतो सो किल पेच्छ सो तस्थावरपणट्ठ सुरनरतिरिक्खजोणीयं । एकन्नवं जगमिणं महभूयविवज्जियं गुहिरं ||२|| लोगम्सि | उदयमज्झमि ॥ १ ॥ १. 'एकोऽहं बहुस्यामः ' 'तस्मादेकाकी न रमते' । ये श्रुतिवचन प्रमाण हैं । २. कहीं कहीं यह पाठ भी है - " वनस्पतिगतश्चाहं सर्वभूतगतोऽप्यहम् ।' For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003599
Book TitleAgam 02 Ang 02 Sutrakrutang Sutra Part 01 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorSudharmaswami
AuthorHemchandraji Maharaj, Amarmuni, Nemichandramuni
PublisherAtmagyan Pith
Publication Year1979
Total Pages1042
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_sutrakritang
File Size17 MB
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